कहानी ख़त्म होने के बाद किरदारों का क्या होता है?

क्या आपने कभी सोचा है कि हम जो कहानी-उपन्यास पढ़ते हैं उसके किरदारों का क्या होता है? ‘शेखर एक जीवनी’ के शेखर-शशि का क्या हुआ? क्या हुआ ‘गुनाहों का देवता’ के सुधा-चंदर का? ‘कसप’ के डीडी-बेबी का देहांत कब हुआ? इसका जवाब मिला डेविड लॉज की किताब ‘Lives In Writing’ पढ़ते हुए। वे लिखते हैं—साहित्यिक किरदारों का कोई पूर्व-इतिहास नहीं होता न उनकी कोई उत्तर-कथा होती है। 

ऐसा कहा जाता है कि हेरोल्ड पिंटर के नाटकों में से एक का मंचन कर रहे एक थिएटर निर्देशक ने नाटककार से यह पूछा कि वे इस सन्दर्भ में कुछ बताएँ कि उनके पात्र मंच पर आने से पहले क्या कर रहे थे। पिंटर का जवाब था—‘अपने काम पर फोकस रखो।’ 

जेन ऑस्टेन के उपन्यास ‘एम्मा’ की नायिका एम्मा वुडहाउस तभी तक मौजूद होती है जब तक कोई उसके बारे में पढ़ रहा होता है।अगर किसी भी समय कोई उसके बारे में नहीं पढ़ रहा होता है (उपन्यास की व्याप्ति और दुनिया भर में अंग्रेजी-भाषी अरबों पाठकों को देखते हुए यह असंभव लगता है), तो वह अस्तित्वहीन हो जाती है। एम्मा, एम्मा के समापन के बाद जीवित नहीं रहती। वह केवल पाठ में रहती है, किसी भव्य देशी हवेली में नहीं। 

कोई भी ‘पाठ’ किताब और पाठक के बीच का लेन-देन होता है। कोई किताब एक भौतिक वस्तु है और तब भी मौजूद रहती है जब कोई उसे न उठाए, लेकिन यह एक ‘पाठ’ के लिए सच नहीं है। ‘पाठ’ अर्थ का एक होता पैटर्न है, और अर्थ के पैटर्न साँपों या सोफ़े की तरह अपना जीवन नहीं जीते हैं।

कुछ विक्टोरियन उपन्यास अपने पात्रों के भविष्य को प्यार से देखते हुए समाप्त होते हैं, उन्हें बूढ़े होते हुए, भूरे बालों वाले और मौज-मस्ती करने वाले पोते-पोतियों की भीड़ के बीच खुश होने की कल्पना करते हैं। उन्हें अपने पात्रों को जाने देना मुश्किल लगता है, जैसे माता-पिता को कभी-कभी अपने बच्चों को जाने देना मुश्किल लगता है। लेकिन किसी के पात्रों के भविष्य को प्यार से देखना, ज़ाहिर है, केवल एक साहित्यिक उपकरण है। 

साहित्यिक किरदारों का भविष्य नहीं होता, उसी तरह से जिस तरह से जेल में बंद सीरियल किलर का कोई भविष्य नहीं होता। शेक्सपियर ने ‘द टेम्पेस्ट’ के अंत में एक खूबसूरत अंश में यह बात कही है: 

खुश रहो सब, अब हमारा उत्सव समाप्त हो गया है। ये हमारे अभिनेता, जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया था, सभी आत्माएँ थीं, और हवा में वाष्प बनकर उड़ गईं; और इस दृष्टि के निराधार ताने-बाने की तरह, बादलों से ढके टावर, भव्य महल, मंदिर, विशाल ग्लोब, हाँ, जो कुछ भी इसे विरासत में मिला है, वह विलीन हो जाएगा, और, इस अवास्तविक तमाशे की तरह फीका पड़ जाएगा, पीछे कोई निशान नहीं छोड़ेगा। हम ऐसे पदार्थ हैं जिस पर सपने बनते हैं; और हमारा छोटा-सा जीवन नींद से घिरा हुआ है…

 

प्रभात रंजन की फ़ेसबुक वॉल से साभार