काठ के पुतले : दोपहरी के अँधेरों में मनुष्यता और संवेदना से लबरेज कहानियाँ

प्रज्ञा के नवीनतम कहानी संग्रह ‘काठ के पुतले’ की समीक्षा 

समीक्षक : मधु कांकरिया

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कुछ कहानियाँ कामनाएँ जगाती हैं तो कुछ कहानियाँ मानवता के बड़े सपनों से टकराती हैं। वे मानवीय गरिमा और मानव मुक्ति के सवाल उठाती हैं। बीसवीं सदी के ढलते वर्षों में विशेषकर सोवियत संघ के विघटन के बाद और भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के आगमन के साथ लेखकों ने भी अपने बड़े सपनों और सरोकारों को बाजार के दबाव में लेखकीय सफलताओं और कामनाओं में रिड्यूस कर दिया है। विराट मानवता के स्वप्न देखना और मुक्ति के सवाल उठाना, देश और समाज के बड़े सवालों से टकराना लोग भूलते जा रहे हैं। 

पहले स्त्री लेखन पर यह आरोप था कि वह निजी चेतना और निजी व्यथा से अनुप्राणित होकर लिखा जा रहा है। लेकिन आज स्त्री लेखन के अर्थ बदल गए हैं, आज स्त्री लेखन की खिड़कियाँ नयी-नयी दिशाओं में खुलती जा रही हैं।

ऐसे में हाल ही में पढ़ा कथाकार प्रज्ञा का पाँचवाँ कहानी संग्रह ‘काठ के पुतले’ आश्वस्त करता है कि कुछ लेखक अभी भी ऐसे हैं जिन्हें चिंता है धरती पर मनुष्य और मनुष्यत्व को बचाए रखने की। इसके लिए प्रज्ञा अपनी कहानियों में समय की शिला पर उफ़ान खाती लहरों से टकराती हैं, जूझती हैं।

संग्रह में कुल नौ कहानियाँ हैं, जो मानव त्रासदी के विविध आयामों को खोलती हैं जो मनुष्यता और संवेदना से लबरेज हैं। ये कहानियाँ आज के जीवन के दमघोंटू बाह्य यथार्थ के चित्रण के साथ-साथ अंतर्मन को भी जागृत करती हैं। रोजमर्रा की ज़िन्दगी में ऐसी कितनी ही साधारण घटनाएँ होती हैं जो हमसे अलक्षित रह जाती है पर ऐसी हर घटना इंसान को इंसान नहीं रहने देती है, इन्हीं छोटी-छोटी अलक्षित घटनाओं को संवेदना के महीन धागों से ये कहानियाँ बुनी गयी हैं। 

प्रज्ञा की कहानियों को जो विशेष बनाती है वह है उनकी पठनीयता, कथ्य की प्रयोजनीयता और प्रासंगिकता। जीवन को बहुत निकट से और सौ-सौ आँखों से देखने का जूनून इनके पास है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘काठ के पुतले’ भरी दोपहरी के अँधेरों की कहानी हैं। मॉल्स की चकाचौंध के भीतर के अँधेरों की यह वह कहानी है जो आज के बनते भारत में युवाओं के हौसलों को तोड़ रही है। जहाँ सेल्स मैन बने युवाओं को जी तोड़ मेहनत के बाद भी बैठने की इज़ाज़त नहीं है। पूरे दिन वे लगभग खड़े रहते हैं क्योंकि उत्पाद बेचने के लिए उन्हें अपनी पूरी साज-सज्जा के साथ कमांडो की सी चुस्ती के साथ खड़ा होना ज़रूरी है। कहानी का एक संवाद देखिये—

सुपरवाइजर के भड़काने पर उसने ललिता और उसके साथियों को समझाने के लिए ऑफिस में बुलवाया। कुर्सी में धँसे हुए वह बोला—

“देखिए! यह हमारे स्टोर का तरीका नहीं बल्कि आसपास किसी भी स्टोर में देखें वहाँ भी सेल्स से जुड़ा कोई भी आदमी कुर्सी पर नहीं बैठता।’’

‘‘पहले से जो चला आया करता है वह क्या हमेशा ठीक होता है सर? गलत बात तो गलत ही होती है।’’ रानो ने कहा तो सुपरवाइजर ने उसे गौर से देखा। पाँच-छह माह का गर्भ उससे छिप नहीं सका।

संवेदनाओं की धड़कती धरती को परत दर परत खोलकर रख देने का हुनर प्रज्ञा के पास है जो इन कहानियों के माध्यम से सामने आया है। ‘काठ के पुतले’ यह मात्र एक मॉल की कहानी नहीं है बल्कि यह बदलते भारत में प्रभुत्वशाली वर्ग की बदलती अमानवीय मानसिकता की कहानी है जिसकी आँखों में सिर्फ़ मुनाफ़े का कसैला धुँआ भरा हुआ है। यह उस भारत की कहानी भी है जहाँ योजनाबद्ध ढंग से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई गयीं, श्रम कानून श्रम के हित में नहीं बल्कि पूँजी के हित में बनाए जा रहे हैं। जहाँ मॉल्स जैसे प्रतिष्ठान हर कानून से ऊपर हैं। बहरहाल यह कहानी युवाओं के भीतर खदबदाते असंतोष की ओर भी इशारा करती आज के समय की एक बेहद ज़रूरी कहानी है। 

संग्रह की एक अन्य कहानी जो अनेक सवालों को उठाती हुई पाठक को अपनी गिरफ़्त में ले लेती है वह है—‘फील्ड वर्क’। कहानी पढ़कर आप आज के हिंदुस्तान की ध्वनियों को सुन सकते हैं, उसे देख सकते हैं। यह दो अलग-अलग दुनियाओं की कहानी है जहाँ एक तरफ कैलिफोर्निया है तो दूसरी तरफ़ कालाहांडी है। एक तरफ खायी-पीयी अघाई महिलाओं की अपनी दुनिया है जिनकी देश दुनिया की ख़बरों का स्रोत व्हाटसएप्प यूनिवर्सिटी है। सत्ता किस प्रकार इन संचार माध्यमों से झूठ का प्रचार कर किसी की भी इमेज को ध्वस्त कर अपना बनाया झूठ स्थापित सकती है, कहानी ऐसी ही छोटी-छोटी बातों का ख़ुलासा करती एक बड़ा रूपक गढ़ती है। कहानी उस समय की है जब भारत के किसान, केंद्र द्वारा लाये तीन काले कानूनों के विरोध में दिल्ली की सड़कों पर, कड़कती ठंड में आंदोलन कर रहे थे और जिस आंदोलन में सैकड़ों किसान शहीद हो गए थे। कहानी की एक पात्र कहती है, “सौ फीसद सच कहा आपने, सात-आठ महीने बीत गए। देखो दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं किसान। कहने को किसान बिलों का विरोध है पर इनके लिए कैसी दिक्कत? धरने की जगह दावतें उड़ाई जा रही हैं। पित्ज़ा और हलवे की पार्टियाँ चल रही हैं। कहाँ की तंगी-गरीबी?”

और यही महिलाएँ जब किसानों की हालत और ग्रामीण विकास को समझने के लिए गाँव का दौरा करती हैं तो विपरीत हालत देख आसमान से गिरती हैं। सुप्रभा को विश्वास नहीं होता कि अब किसानों के पास न अपनी ज़मीनें बची हैं न खेत। 

“खेती की जमीन अपनी है?” अबकी सुप्रभा ने बात की गहराई में जानेवाला सवाल किया।

“जिनके साथ आप सभी आई हो उन्होंने कुछ नहीं बताया क्या?” देहाती लोगों में साहस स्पष्टता का सबसे धवल रंग होता है। सुप्रभा के साथ मिसेज मंडली चकित होकर उस स्त्री को देखने लगी। मिसेज सिंह अपने भाई के बारे में ऐसी बात करनेवाली स्त्री को घूरने लगीं।

“नहीं।” सीधी बात का सीधा जवाब सुप्रभा ने स्त्री की आँखों मे आँख डालकर दिया।

“हम सब जनी खेत मजूर हैं। जो आए थे उनके खेत की मजूर। उनके जैसे कुछ और लोगों के खेत भी यहाँ हैं।” एक अन्य स्त्री ने सभी की ओर देखकर कहा।

“उनका घर तो बड़ा शानदार है आप सबके घर की हालत तो…”

प्रज्ञा की दृष्टि अभावों की सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जड़ तक पहुँचकर सत्य को निकालकर लाती है। प्रखर वैचारिकता और प्रखर संवेदना दोनों इस कहानी में है। ‘फील्ड वर्क’ में चमचमाते जीवन की अभ्यस्त स्त्रियाँ जब ग्रामीण सीतू बउ से मिलती हैं तो उनकी कृत्रिमता और भी क्षुद्र नज़र आती है। एक लोक कलाकार सीतू को नीचा दिखाने के लिए उन तथाकथित सभ्य, सुसंस्कृत शहरी महिलाओं का आभिजात्य धराशायी हो जाता है। चावल का एक और दाना देखिये—

“हाँ, हम भी गए थे बम्बे अब तो मुम्बई कहते हैं न। बड़ा प्रोग्राम था उस बार। ताज में टिकाया था हम सबको। शरीर में थकान समाई हो तो क्या ताज क्या गाँव? एक बिस्तर ही तो चाहिए सोने भर को।” सीतू ने ताज को उसके सारे गौरव से हीन करते हुए सहजता से उसे थकान उतारने की एक जगह से ज्यादा न माना। 

वैभव की खोखली शान लिए शहरी स्त्रियाँ इस पर भी सीतू को वर्गीय आधार पर कमतर पाती हैं जबकि पाठक की दृष्टि में सीतू का विराट चरित्र सामने आता है। ‘फील्ड वर्क’ कहानी में बिना लाउड हुए लेखक एक मानवीय सत्य का उद्घाटन करती हैं कि पेट की

भूख मनुष्य की सौंदर्य चेतना पर भी ग्रहण लगा देती है। इसीलिए कहा गया है कि भूखे व्यक्ति को चाँद भी रोटी की तरह गोल ही नज़र आता है। 

दबे-कुचले स्वाभिमानी चरित्रों के साथ प्रज्ञा का गहरा जुड़ाव शुरू से रहा है, जिनकी जिजीविषा बद से बदतर होते हालात में भी जीवित है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा ये कहानियाँ दोपहर के अँधेरों को पाठक के सामने ले आती हैं और यथार्थ को उसके अंतर्विरोधों सहित उजागर कर देती हैं। 

‘काठ के पुतले’ संग्रह में लोगों को व्यापक रूप से ठग रहा तकनीकी जाल ‘आप कुछ नहीं जानते’ कहानी के माध्यम से सामने आता है। यह कहानी दो स्तरों पर पाठक को बाँधती है। एक ओर साइबर क्राइम की बढ़ती वारदातें और दूसरी ओर इस दुर्घटना के शिकार पिता और उनके बेटे के बीच बन गई दूरियों से उपजा तनाव। प्रज्ञा अपने कथा कौशल से कहानी को एक बेहतर और सकारात्मक मोड़ पर ले आती हैं। 

इसी तरह एक अन्य कहानी ‘काना प्लाट’ आज के समय की कहानी है जो पूँजी के पूरे खेल में साम्प्रदायिक ताकतों का स्याह चेहरा दिखाती है। कहानी किसी दंगे की ओर न बढ़कर एक समरसता की जमीन तैयार करती है जिसे हम हिन्दुस्तान कहते हैं। व्यंग्य बोध से जुडी ये कहानी अपना प्रभाव पाठक के मन पर अंकित करती है। ग्रामीण परिवेश में रची गयी ‘माया मरी न मन मरा’ स्त्री पक्ष की सशक्त कहानी है। ‘गुलमोहर के गुच्छे’, ‘सीताओं की देहरी’ आदि कहानियाँ भी व्यापक सरोकारों की कहानियाँ हैं। 

प्रज्ञा की कहानियों के स्त्री पात्र पितृसत्ता के द्वारा गढ़ी स्त्री छवियों से टकराती हैं और एक ऐसी स्त्री को सामने लाती हैं जो स्वाभिमानी हैं और स्वतंत्रता की चाह रखती हैं। 

मेरी दृष्टि में किसी भी रचनाकार का पहला दायित्व यह होता है कि वह अपने समय के यथार्थ को उसकी व्यापकता में सच्चाई के साथ प्रस्तुत करे। और दूसरा दायित्व यह कि वह वहीं तक सीमित न रहे बल्कि वह यह भी दिखाए कि मनुष्यता के पक्ष में क्या किया जा सकता है। ज़ाहिर है कि इस ओर जाने के लिए कोई एक बना-बनाया रास्ता नहीं हो सकता। उसके लिए हमें अनेक रास्तों और पगडंडियों को रचना होगा। संभवतः साहित्य की सभी विधाएँ इन्हीं रास्तों की खोज ही तो हैं जिन पर चलने का आग्रह सदियों से रचनाकार कर रहे हैं। 

मेरा मानना है कि प्रज्ञा की कहानियाँ पारम्परिक किस्सागोई की शैली में इसी विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ लिखी गयी हैं। सवालों की प्रखरता और विचार का ठोस धरातल इन कहानियों के ज़रिये हमारे आज के यथार्थ को सामने ले आता है तो व्यापक मनुष्यता की बेहतरी का संघर्ष इनमें रचा बसा है। प्रज्ञा के पास चरित्रों को रचने का कौशल है। सघन तनाव की स्थितियों में ये चरित्र अपना विकास करते हैं, प्रज्ञा की कहानियाँ आज़ाद भारत की सच्ची कहानियाँ है।

 

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