‘ना’ कहने की आज़ादी

अनुराधा बेनीवाल के यात्रा-वृत्तान्त ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ के चुनिंदा अंश

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मेरी निजता सिर्फ़ मेरी देह के मुक्त होने भर में नहीं—यह मैंने बहुत जल्द समझ लिया था। वह भी ज़रूरी है, आज भी मानती हूँ। लेकिन असली आज़ादी का बोध उतने भर में सीमित नहीं। देह की आज़ादी को पाना आसान है। इस लड़ाई से पार पाना अपने वश में है; बशर्ते ‘बिगड़ी हुई’, ‘ज़्यादा-ही-फॉरवर्ड’, ‘बदचलन’, ‘चरित्रहीन’, ‘लूज़ कैरेक्टर’, ‘होर’, ‘रंडी’—जैसे विशेषणों को हँसकर उड़ाने भर की मानसिक मज़बूती हो। आर्थिक आज़ादी ने काफ़ी हद तक देह को आज़ाद कर दिया। लेकिन उसको पूरी आज़ादी अच्छे-बुरे की कंडीशनिंग टूटने से मिली। सिर्फ़ किसी के साथ सो सकने की आज़ादी ही नहीं, किसी के साथ ‘नहीं’ सो सकने की आज़ादी भी। किसी भी तरह की हिचक और परवाह से आज़ादी!

मेरे जीवन में सारी मुश्किलें तब तक थीं, जब तक पाँव दोनों नावों में साधे रखने की कोशिश बनी हुई थी। एक तरफ़ मान्यताओं और पाबंदियों से आज़ाद भी होना था और दूसरी तरफ़ ख़ुद को ‘संस्कारी’ भी कहलवाना था। देह और मन की भी सुननी थी और समाज की भी। लेकिन जब मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे कैसा होना है या कैसे जीना है, यह केवल मैं तय करूँगी—तो जाने किस तरह से आस-पास के परिचित, दोस्त-रिश्तेदार भी मेरे अनुकूल होते चले गए! मेरी बेपरवाही ने मेरा जीना आसान कर दिया।

मैंने एक बात महसूस की है। सबके मामले में सही है कि नहीं, कह नहीं सकती। लेकिन जब भी मैंने अपने ऊपर यकीन किया है और दूसरों की परवाह किए बगैर अपनी मर्जी की इज़्ज़त की है, तब जाने कैसे, औरों ने भी मेरी मर्जी की इज़्ज़त की है।

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जितनी गिरहें ज़िन्दगी की हैं, आज़ादी की उससे ज़्यादा ही होंगी। एक को खोलिए तो दूसरा सामने ऐंठा रहता है। ये सब सामाजिक सभ्यता के निर्माण की गाँठे हैं, जिनसे जीवन को भले स्थायित्व मिला, लेकिन पग-पग पर उसकी चाल को झटका लगा। अब मुझे ही देखिए। एक छोटी-सी आज़ादी थी जो मुझे नहीं मिल सकी कभी। वह ऐसी कोई बड़ी बात न थी। उसे मेरा समाज मुझे दे सकता था। उसे मेरे आस-पास के लोग मुझे दे सकते थे। परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों से वह मुझे मिलनी चाहिए थी—केवल चल सकने की आज़ादी। टैम-बेटैम, बेफ़िक्र-बिंदास, हँसते-सिर उठाए सड़क पर निकल सकने की आज़ादी। कुछ अनहोनी न हो जाए—इसकी चिंता किए बगैर, अकेले कहीं भी चल पड़ने की आज़ादी। घूमते-फिरते थक जाएँ तो अकेले पार्क में बैठकर सुस्ता सकने की आज़ादी। नदी किनारे भटकते हुए हवा के साथ झूम सकने की आज़ादी। जो मेरे मनुष्य होने के अहसास को गरिमा भी देती है और ठोस यकीन भी।

अपनी मर्ज़ी का संसार हम बना नहीं सकते। लेकिन क्या इस संसार में अपनी मर्जी से हम कहीं आ-जा भी नहीं सकते! महज इसलिए कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए; किसी पुरुष के भीतर कहीं कोई जानवर न जाग जाए? लेकिन राह चलते हुए तो पशु भी यों पीछा करके किसी को नहीं दबोचते! तो क्या पुरुष के भीतर जानवर का जगना गलत मिसाल है। हाँ, गलत ही है।

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पुष्कर में मिला मुझे फर्नांदो रेन्नी जो अपने को नंदू बुलाता था। नंदू ना कभी स्कूल गया था और ना ही कभी दफ़्तर! नंदू के हाथों में कला थी, मेटल और पत्थर को सुंदर ज्वैलरी में तब्दील करने की। वह उसी कला के दम पर अपने देश ब्राजील से बाहर निकल दुनिया घूम रहा था। अपने हाथों से बनाई ज्वैलरी को सड़कों पर बिछाकर बेचता हुआ नंदू अपनी चालीस साल की उम्र में अस्सी से ज़्यादा देशों में घूम चुका था। उसने मुझे पुष्कर में सबसे सस्ती रहने और खाने की जगह दिखाई। उसने अपने लिए बहुत ज़रूरी, लेकिन मेरे लिए पर्सनल सवाल पूछ लिया, ‘विदेशी लड़कियों को भारतीय लड़कों के साथ सोने में कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन भारतीय लड़कियाँ कभी विदेशी लड़कों को भाव नहीं देतीं, ऐसा क्यों? भारतीय लड़कियों से तो बात करना तक मुश्किल है!’ 

मैंने बिना अचकचाए कहा—‘इस बारे में कभी सोचा तो नहीं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमें विदेशी लड़कों से कोई दिक्कत है। हमें तो सब लड़कों से दिक्कत है। लड़कों से नहीं, हमें यों ही कैज़ुअल सेक्स से दिक्कत है। और भारतीय लड़का तो रहेगा, एक दिन शादी कर लेगा। लेकिन विदेशी तो चला जाएगा। हम सिर्फ़ शादी के बदले सेक्स करती हैं!’ मैं अपने दिए जवाब पर हैरान थी! ख़ैर, अगर उसने किसी ख़ास मकसद से वह सवाल पूछा था तो वह पूरा नहीं हुआ। यह ज़रूर हुआ कि मैंने एक अजनबी को नम्रतापूर्वक ‘ना’ कहना सीखा। बिना चप्पल निकाले, हाथ जोड़कर अलविदा बोलना सीखा। अपनी मर्जी जानी और अपनी मर्जी की इज़्ज़त करना सीखा।

जैसलमेर में ही मिली मार्लुस रेगिस्तान से जुड़ी हर चीज़ की दीवानी थी। उसने सब ऊँट वालों से दोस्ती कर ली थी और उन्हीं के साथ हफ़्तों-हफ़्तों रेगिस्तान में घूमती रहती। मुझे उसके लिए कभी डर लगता, तो वह हँसती और कहती, ‘सब भारतीय लड़के मुझसे डरते हैं।’ लगभग पौने छ: फुट लंबी-तगड़ी जवान थी जर्मनी से आई मार्लुस। एकदम निडर! अकेले घर से निकलने से पहले मार्लुस की माँ ने उसे ख़ूब सारी सलाहों के साथ एक सलाह यह भी दी थी, ‘अपना ख़ूब ख़्याल रखना। पागल कुत्ते तो कहीं भी हो सकते हैं, तो अगर रेप हो जाए तो प्रेगनेंसी से बचने के लिए पिल्स अपने साथ रखना!’

मैंने पहली बार किसी माँ को रेप होने के सिलसिले में सलाह देते हुए जाना था। मैंने या तो माँओं को इस बारे में बात करते ही नहीं सुना, या सुना था कि ‘यहाँ/वहाँ इस वक़्त सेफ़ नहीं है, बाहर मत जाओ!’ लेकिन अपनी बेटी को रोकने की बजाय, हादसा होने पर क्या किया जाए—इस बारे में सलाह देना पहली बार सुना था! मार्लुस की माँ कहती है कि, ‘रेप भी एक एक्सीडेंट है जो नहीं होना चाहिए, लेकिन होने पर शर्म की बजाय उस बारे में क्या किया जाए, यह पता होना चाहिए।’ ऐसी माँ की बेटी कैसे निडर नहीं होगी? यहाँ से मैंने साहस सीखा।

 

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