राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, चन्द्रकिशोर जायसवाल की कहानी ‘दुखिया दास कबीर’। यह कहानी उनकी ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ में संकलित है।
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ऐसी हर डोर टूट चुकी थी जो नकछेदी दास को, यह धरती तो क्या, अपने गाँव सिमराही तक से बाँध कर रखे।
कहाँ थी कोई डोर?
कोई औलाद नहीं थे उसके, न बेटा न बेटी। पिछले साल घरवाली भी गुजर गई। दूर-पास कोई रिश्तेदार नहीं था, साला-बहनोई तक नहीं। गाँव में कोई यार-दोस्त तक नहीं था, जिसके पास दो घड़ी बैठकर मन लगा ले। एक गाय तक नहीं थी उसके पास, जिसे वह माँ की तरह प्यार करे और जिसके बछड़े को बेटे की तरह दुलार-मलार। पूरे गाँव में एक कुत्ता तक नहीं था, जो उसे देखते ही पूँछ हिलाने लगे। उसके घर कोई बिल्ली नहीं आती थी; किसके लिए दूध खरीदकर रखे वह! नितान्त अकेला रह गया था वह बूढ़ा इस दुनिया में।
इस चौथपन में जिसे अपने परलोक की चिन्ता करनी थी उसे अचानक ही देश-दुनिया की चिन्ता सताने लगी। शुरू में किसी को यह गुमान तक नहीं था कि नकछेदी दास पागल होने जा रहा है, नहीं तो उसी वक्त सिकटोही के धरीछन ओझा से झाड़-फूँक करवा देते; सेर-सवा सेर चावल से अधिक का खर्च नहीं पड़ता। उस वक्त तो लोगों को यही लगा था कि और बूढ़ों की तरह नकछेदी दास भी सठिया गया है। तब लोग उसकी हरकतों पर दिलचुटकियाँ लेते। पागलपन का पता तो तब चला, जब मर्ज लाइलाज हो चुका था। अब तो धरीछन ओझा भी आकर नखरे पसारते। गाँववाले भी क्या-क्या करें उस आदमी के लिए, जिसके मरने के बाद कोई उसका नाम लेवा तक नहीं रहेगा! एक भार तो है ही उनके ऊपर कि इस बूढ़े के मरने पर उसकी मिट्टी ठिकाने लगानी है; अब ऊपर से यह भी कि मरने तक उसे ठीक-ठाक रखना है...धरीछन ओझा न जाने कितने दिन लगा देगा! वह रोज-रोज माँगेगा सवा सेर चावल, दो बोतल दारू, रोज एक मुरगी, और न जाने क्या-क्या! कौन रोज बेहरी माँगता फिरेगा गाँव में? दीना मास्टर ने पागल बनाया है इस बूढ़े को, तो अब कराए वही इसका इलाज।
सिमराही में अगर सचमुच कोई कूप-मंडूक था, तो वह था अकेला नकछेदी दास। साल-दो साल में ही कभी एक-आध बार सिमराही के बाहर पैर रखता वह; वह भी अगल-बगल के गाँवों से बाहर नहीं जाता होगा। देश-देसावर की खबरें सुनने का न तो कभी मौका मिला था उसे और न कभी उसकी इच्छा ही होती थी। वह तो यही समझ रहा था कि जो कुछ अपने सिमराही में हो रहा है वैसा ही सब कुछ इस सिमराही के बाहर भी हो रहा होगा। तीस-पैंतीस साल पहले इस गाँव में एक हत्या हुई थी। महाबीर मोदी ने अपनी औरत का गला काट दिया था। पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। तब से आज तक कुछ नहीं हुआ है। खेत में मेंड़ को लेकर रामबुझावन राय और हरिकिशोर सिंह के बीच बात बढ़ी थी जरूर, मगर सिर्फ लाठियाँ तनकर रह गई, किसी तरह खून नहीं हुआ। बलात्कार की एक भी घटना नहीं। ऐसे तो हर पहर खेत-बहियार झाँकने कोई नहीं जाता, मगर कुछ जायज-नाजायज हुआ भी होगा, तो बहुत हल्का-फुलका। ऐसी कोई घटना नहीं हुई, जो गाँववालों के लिए खबर बन जाए। कम-से-कम ऐसी कोई खबर नकछेदी दास के कानों तक नहीं पहुँची थी। सिमराही में डकैती न तो पहले कभी हुई थी न भविष्य में कभी होने की आशंका थी। माल-मता वाले दो ही गृहस्थ थे इस गाँव में, रामबुझावन राय और हरिकिशोर सिंह, और दोनों के पास बन्दूकें थी। ऐसे सिमराही के नकछेदी दास ने जब सुना कि देश-देसावर में दिन दहाड़े डकैतियाँ, बेशुमार बलात्कार और हर रोज हत्याएँ हो रही हैं, तो उसका माथा चकरा गया। यह दीना मास्टर अगर दस बरस पहले आए होते इस गाँव में, तो नकछेदी दास दस बरस पहले ही सनक गया होता।
सिमराही में अखबार पढ़ने की लत किसी को नहीं थी। मुखिया रामबुझावन राय अगर कभी पूर्णिया या मधेपुरा जाते, तो लौटते समय साठ पैसे का श्राद्ध महज इसलिए कर देते कि हाथ में अखबार झुलाते हुए गाँव में घुसना उन्हें अच्छा लगता था। जिस दिन वे अखबार लेकर आते थे उस दिन भी कोई उनके पास देश-दुनिया की खबरें जानने नहीं आता था। दीना मास्टर के आने के बाद ऐसा हुआ कि सिमराही में भी रोज अखबार पढ़ा जाने लगा।
अखबार पढ़ने का रोग दीना मास्टर को बहुत पहले लग चुका था। सिमराही विद्यालय में शिक्षक होकर जब वे यहाँ आए, तो आते ही उन्होंने अखबार की व्यवस्था कर ली। विद्यालय का चपरासी सोनू, जो रोज अपने घर पिपराही से आता था, दीना मास्टर के लिए अखबार लाना नहीं भुलता था। रविवार या किसी छुट्टी के दिन भी सिर्फ अखबार पहुँचाने के लिए उसे सिमराही आना पड़ता था। विद्यालय में छुट्टी की घंटी बजते ही दीना मास्टर सामने मैदान में कुरसी-मेज निकलवा लेते और अखबार लेकर वहाँ जम जाते। कुरसी पर बैठे हुए मेज पर टाँगे फैलाकर वे घंटों अखबार को चाटते रहते। छुट्टी के दिन वे दोपहर से शाम तक अखबार ही पढ़ते रह जाते।
इसी दीना मास्टर के पास अखबार की खबरें सुनने नकछेदी दास पहुँचता था।
पहले दिन नकछेदी दास भी दीना मास्टर के पास अखबार की खबरें सुनने नहीं गया था। उसने जो देखा कि गाँव के विद्यालय का नया शिक्षक मैदान में अकेला बैठा अखबार पढ़ रहा है, तो महज जान-पहचान करने के इरादे से उनके पास पहुँच गया था। एक सवाल लेकर पहुँचा था वह, “मास्टर बाबू, इस साल वर्षा होगी या नहीं?”
मास्टर बाबू का ध्यान भंग हुआ, तो उसने देखा कि सामने एक देहाती बूढ़ा खड़ा है। बूढ़े का मुस्कराकर स्वागत तो किया उसने, मगर उसके सवाल का कोई सही जवाब देने के बजाय उसके आगे एक लम्बा-चौड़ा भाषण झाड़ दिया, जिसका सारांश था, “इस पाप के जमाने में अब प्रकृति का भी कोई नियम नहीं रहा। कभी तो समय पर बिलकुल वर्षा नहीं होगी, और कभी इतनी वर्षा होगी कि पानी में इलाका डूब जाए। धरती पर पाप बढ़ता जा रहा है और दुनिया विनाश की ओर बढ़ रही है।” अपने भाषण को असरदार बनाने के लिए मास्टर बाबू ने अखबार की ढेर सारी खबरें उस देहाती बूढ़े को सुनाईं। नकछेदी दास को तब पता चला कि सिमराही के बाहर कुछ और ही हो रहा है। हत्या, डकैती और बलात्कार की ढेर सारी खबरें सुनकर पहले ही दिन उसका माथा चकरा गया था। वह सोच में पड़ गया था और काफी उद्विग्न हो उठा था। उस दिन मास्टर बाबू से विदा लेते हुए उसके मुँह से इतना भर फूटा था, “मेरा नाम नकछेदी दास है। आपका नाम क्या है, मास्टर बाबू?”
उस दिन के बाद ही ऐसा परक गया नकछेदी दास कि रोज-रोज दीना मास्टर के पास हत्या, डकैती और बलात्कार की खबरें सुनने के लिए जाने लगा; एक दिन की भी डुबकी कभी नहीं लगाई।
नकछेदी दास जाए भाड़ में। दुनिया-जहान की अलाय-बलाय खबरें सुने और सुन-सुनकर दुबलाए; गाँववालों को उससे क्या लेना-देना! काशीधाम में कौए की मौत और वृन्दावन में हाहाकार! मगर नकछेदी दास है कि पूरे गाँव को दिक करने पर लगा हुआ है। दीना मास्टर के अखबार से खबरें उठाता है और पूरे गाँव को बाँटने दौड़ पड़ता है। अब सब काम-धाम छोड़कर आप उससे खबरें सुनिए और फिर उसके साथ बैठकर रोइए। ऐसा बुरबक और इतना निठल्ला कोई नहीं है सिमराही में।
नकछेदी दास की असली काट जगलाल साह।
विद्यालय का मैदान पारकर सड़क पर आते ही जगलाल साह अपने दरवाजे के सामने चौकी पर बैठे नजर आ जाते हैं नकछेदी दास को। वहाँ पहुँचते ही चालू हो जाता है निठल्ला नकछेदी, “आज तो बहुत ही बुरी खबर है, साह जी। एक परिवार के सात आदमी काट डाले गए हैं। पूरा परिवार स्वाहा।”
“हूँ।”
“यह घटना संझेली की है,” बताता है नकछेदी दास और फिर जोर देकर बोलता है, “संझेली अपने ही देश में है, जिला मुँगेर, थाना महमदिया।”
“हूँ।”
““पहले कहीं एक आदमी की हत्या होती थी, तो पूरे इलाके में उसकी गूँज होती थी; खलबली मच जाती थी हर जगह।
“हूँ।”
“आपको याद होगा कि सिमराही में महावीर मोदी ने अपनी औरत को काटा था, तो पूरे इलाके में महीनों इस बात की चर्चा होती रही थी।”
“हूँ।”
“मुझे याद आ रहा है कि वह हाट का दिन था, बुधवार या शनिवार।”
“हूँ।”
“शनिवार ही था।”
“हूँ।”
थेथरई में कोई किसी से कम नहीं; न तो नकछेदी दास किरिया खाता कि अब खबरें सुनाने इस ‘हूँ-हाँ’ साह के पास वह कभी नहीं जाएगा और न जगलाल साह अपने मन में कभी यह बात आने देते कि आगे से वह अपना ‘हूँ-हाँ’ का खर्च भी बन्द कर देगा।
नया बजनिया, टीक में झाल।
एक दिन मोती बाबू ने हँसते हुए हरिकिशोर सिंह सरपंच को सुनाया, “आज नकछेदी मुझसे कह रहा था कि बलात्कार की क्या सजा है।”
“अरे बाप! नकछेदी पूछ रहा था यह?”
“हाँ, आज ही।”
“यह सवाल पूछने का मतलब?”
“राम जाने; मैं तो अभी तक हैरान हूँ।”
“दुनिया में कुछ भी हो सकता है मोती बाबू। किसके मन में क्या है, कौन बता सकता है! हमारे यहाँ तो ऋषि-मुनि तक भ्रष्ट हुए हैं। क्या जवाब दिया आपने नकछेदी को?”
“मैंने तो कहा कि होती होगी दो-चार साल की सजा।”
“साल ही कहा था न; महीना तो नहीं निकल गया था मुँह से?”
“अब आप पूछ रहे हैं, तो कुछ शंका हो रही है।”
“तो फिर अभी ही उसे ढूँढ़कर सुना दीजिए कि बीस साल से कम की सजा नहीं होगी।”
किसी-किसी को तो बासी कढ़ी की इस उबाल पर कुछ और
ही शंका होती है। बूढ़ापे में कोई खुटचाल तो नहीं चल रहा है यह
नकछेदी दास? जो अब तक गाँव से ही बन्द रहा, उसे अब कोई गद्दी चाहिए क्या? राम जाने, दीना मास्टर कोई पेंच तो लड़ा नहीं रहे हैं इस गाँव में!
मुखियाजी के साथ गप-शप के दौरान मानिकलाल उन्हें यह भी सुना ही देते हैं, “गाँव में एक नया नेता पैदा हुआ है, इसकी खबर आपको है या नहीं?”
“नया नेता...कौन?”
“नकछेदी...और कौन! हिन्दुस्तान से लेकर जापान तक की बातें करता है। घर-घर पहुँचता है खबरें सुनाने।”
“तब तो लगता है कि अब दिल्ली जाकर ही दम लेगा।”
“दिल्ली नहीं भी जाए, मगर सिमराही का मुखिया बनने की बात तो जरूर सोच रहा होगा वह।”
“आप भी कभी-कभी बौड़हा की तरह बातें करते हैं। मुखिया बनेगा नकछेदी दास। टिटिही टिकाए पर्वत को!”
“नकछेदी दास तो इस तरह कर रहा है, उसके पीछे कोई राज तो अवश्य है। अब मुझे यह क्या पता कि गाँव में कौन क्या पेंच लड़ा रहा है। मुझे शंका हुई, तो आपको सवाधान कर दिया।”
“अच्छा ही किया। अब उस पर नजर तो रखनी ही पड़ेगी।”
अब तक तो लोग यही समझते रहे थे कि बूढ़ा नकछेदी सठिया गया है। उसके पागल हो जाने की बात तो गाँव में तब नाची, जब गाँववालों को पता चला कि नकछेदी दास रूस और अमेरिका के राजाओं को चिट्ठी लिखा करता है।
लूट, बलात्कार और मार-काट की खबरें तो नकछेदी दास को उद्वेलित करती ही रहती थीं, मगर अखबार में ऐसी खबर आई, जिसने उस बूढ़े को मसलकर रख दिया।
दीना मास्टर ने सुनाया, “अब इस संसार का विनाश निश्चित है, दासजी; महायुद्ध होने जा रहा है।”
“महायुद्ध?...यह कैसा युद्ध होगा?
“बहुत ही भयंकर,” दीना मास्टर ने अखबार एक ओर रखते हुए कहा, इस युद्ध के बाद धरती पर कोई आदमी जिन्दा नहीं रहेगा।”
“ऐसा युद्ध?”
“हाँ, यह परमाणु युद्ध होगा। एक साथ सारे लोग मर जाएँगे, सारे विश्व का नाश हो जाएगा।”
“एक साथ सारे लोग मर जाएँगे!” बुदबुदाया नकछेदी दास,
“यह कैसे?”
“परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होगा, तो सारे प्राणी और पेड़-पौधे जलकर राख हो जाएँगे। धरती उबल जाएगी। घोर अँधेरा छा जाएगा।”
“ऐसा हो जाएगा?” नकछेदी दास की आँखें भय और अचरज से फैल गई थीं।
दीना मास्टर हाँ में सिर हिलाते रहे।
“हम लोग तो,” एक क्षण के बाद नकछेदी दास ने मुँह खोला, “यह युद्ध नहीं चाहते?”
“नहीं चाहने से क्या होगा?” दीना मास्टर ने जवाब दिया, “धरती के किसी एक कोने में भी यह युद्ध शुरू हुआ, तो उसका असर दूसरे कोने पर भी पड़ेगा। लड़ेंगे दूसरे लोग और मारे जाएँगे सब। हर देश इस युद्ध की चपेट में आ जाएगा।”
बेचारा बूढ़ा अथाह में पड़ गया। क्षण भर की चुप्पी के बाद उसने फिर आहिस्ते से पूछा, “ये हैं कौन, जो ऐसा युद्ध करने को तैयार हैं?”
“अभी तो दो देश हैं, रूस और अमेरिका।”
“कोई इन्हें समझानेवाला नहीं है?”घिघिआहट झलक रही थी नकछेदी दास की आवाज में।
“है क्यों नहीं, मगर ये मानें तब तो!” दीना मास्टर का स्वर भी मायूसी भरा था, “बात-बात में उछलते हैं ये। कोई कहाँ-कहाँ मनाए इन्हें, और किसी के मनाने से भला ये कब माननेवाले!”
“पागल हो गए हैं क्या!” बुदबुदाया नकछेदी दास, “समझाने से भी नहीं समझेंगे!”
मन इतना भारी हो गया था नकछेदी दास का कि उठने के लिए जोर लगाना पड़ गया था उसे।
समझाने से तो बड़े-बड़े पापी और हत्यारे तक राह पर आ गए हैं, घर पहुँचने तक रास्ते भर यही सोचता रहा नकछेदी दास। सोच में इस कदर डूबा हुआ था कि रोज की तरह अपनी चौकी पर बैठा जगलाल साह तक उसे दिखाई नहीं पड़ा। घर आकर भी चैन नहीं। छाती छलनी हो रही थी इस चिन्ता से कि युद्ध करनेवालों को क्या कहकर समझाया जाए। कैसे तो उस बूढ़े के जेहन में यह ख्याल आ गया कि वह रूस और अमेरिका के राजाओं को अपनी ओर से चिट्ठी लिखे!
क्या लिखेगा चिट्ठी में, यह मन ही मन सोचने लगा था नकछेदी दास। रात में बिस्तर पर जाते ही वह अपनी चिट्ठी सजाने लगा, “पतरी रूस के राजा और अमेरिका के राजा जोग लिखा परगना निसंखपुर, गाँव सिमराही से नकछेदी दास का राम राम। भगवान आपको राजी-खुशी बनाए रखें, जो सुनकर दिल खुश हो। हम ईश्वर से मनाते हैं कि आप चकरवती राजा बनें और आपका तीनों लोक में नाम हो। बाद समाचार यह है कि आपके बारे में अखबारवाले अफवाह फैला रहे हैं कि आप एक युद्ध करने जा रहे हैं, जिसमें सारी दुनिया नष्ट हो जाएगी। हम इस खबर को झूठा मानते हैं। ऐसा तो कोई राजा कर ही नहीं सकता कि अपना राज्य ही जला डाले। राजा के लिए तो प्रजा बेटे के समान हैं। गोसांई जी ने रामायण में लिखा है...“रामायण में क्या लिखा है, गोसांईजी ने, नकछेदी दास को पता नहीं, मगर इससे क्या! कुछ तो लिखा ही होगा उन्होंने, और दीना मास्टर को वह चौपाई जरूर याद होगी।...” और दास कबीर ने भी कहा है कि ढाई आखर प्रेम का जो पढ़ ले वही पंडित। और स्वामी मेंहीं दास ने भी कुप्पा घाट पर सत्संग में कहा था कि आदमी को एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।...तब फिर आपके जैसे गुणी और बुद्धिमान राजा को क्यों बदनाम किया जा रहा है, मेरी समझ में नहीं आता। आप अखबारवालों को बता दीजिए कि आप युद्ध कभी नहीं करेंगे, कि युद्ध की बात आप कभी सोचते भी नहीं, कि कोई पागल ही होगा जो सारे लोगों की हत्या का पाप अपने सिर लेगा, कि लोग झूठ-मूठ आपको बदनाम कर रहे हैं, कि अब ऐसी कोई अफवाह फैलाई नहीं जाए, कि...”
भोर होते ही दिशा मैदान से आकर नकछेछी दास दीना मास्टर के डेरे पर पहुँच गया, हाँक लगाकर उन्हें बाहर बुलाया और फिर कहा, “कागज-कलम लेकर आइए, मास्टर बाबू; चिट्ठी लिखवानी है।”
रूस और अमेरिका के राजाओं को चिट्ठी भेजने की बात जैसे ही गाँव में गूँजी, लोगों को पुख्ता यकीन हो चला कि नकछेदी दास पगला गया है। फिर तो गाँव भर को खबरें सुनानेवाला नकछेदी खुद ही एक खबर बन गया गाँववालों के लिए, रोज ही एक टटका खबर। उसकी एक-एक हरकत पर गाँववालों का ध्यान जा रहा था।
बच्चों का कोई झुंड कहीं खेलता रहता, तो नकछेदी दास उनके पास खड़ा रहकर देर तक निहारता रह जाता उन बच्चों को। उन बच्चों में से किसी एक के बारे में भी उसे पता नहीं होता कि वह किसका पोता है और किसका बेटा है, मगर तब भी उन पर आशीष की वर्षा कर देता वह, “तुम सब भी मेरी ही तरह बूढ़ा झंखाड़ होना, झुलझुल बूढ़ा। मेरी ही तरह तुम्हारे भी बाल सफेद हों, दाँत टूटे...” और फिर अचानक ही वह सिहर जाता कि कहीं उसके आशीष निष्फल न रह जाएँ! उसकी आँखों में आँसू तैर आते, इन छगन-मगन को यह युद्ध अपनी जवानी तक भी पहुँचने देगा या नहीं!
बच्चों के पास खड़ा होकर क्या निहारता है नकछेदी दास, यह सवाल लोगों के मन को मथने लगता।...औलाद नहीं होने का दुःख कितना बड़ा होता है कि आदमी को पागल तक बना देता है!...निपुत्तर नकछेदी अपनी आँखों से कोई जहर तो नहीं फैला रहा है? ये सारे बच्चे अपने-अपने घर सकुशल पहुँच जाएँगे न आज?...
गाँव से किसी दुलहिन की डोली गुजरती, तो जहाँ गाँव के बच्चे शोर मचाते हुए दुलहिन को चिढ़ानेवाला गीत गाते, “कनियाँ का मुँह काला है, परदा नहीं हटाएगी। कनियाँ नकटी, कानी है, मुखड़ा नहीं दिखाएगी,” वहीं बूढ़ा नकछेदी भी अपनी टकटकी उस डोली पर बाँध देता। वह बहुत अस्थिर हो उठता यह सोचकर कि पता नहीं, कब तक यह जोड़ी सलामत रहेगी। उनकी सलामती भी तो रूस और अमेरिका के राजाओं के हाथ में थी। अपनी जिस दुनिया का सुन्दर सपना देख रहे होंगे दुलहा-दुलहिन, उसको मिटा देने का भी तो षड्यंत्र चल ही रहा है।
डोली पर टकटकी बाँधकर खड़े नकछेदी दास को गाँववाले देखते हैं, तो भौंचक रह जाते हैं, “यह क्या हो गया है इस बूढ़े को? इस चलाचली की वेला में...धरीछन ओझा को आज न कल बुलाना ही पड़ेगा। गाँव से गुजरती डोलियों को इस तरह देखते हुए मर गया बूढ़ा, तो मरने के बाद भी...आस-पास के गाँवों से कहार जब दुलहिन की डोली उठाएँगे, तो घरवाले उन्हें हिदायत कर देंगे, सिमराही होकर मत जाना; कोई प्रेत है वहाँ जो हर दुलहिन की डोली का पीछा करता है...
अमराई से गुजरते हुए कोयल की कूक नकछेदी दास के कानों में पड़ती है, तो वह ठिठककर खड़ा हो जाता है, और फिर कोयल के साथ वह भी कूकने लगता है, कू...कू...कू...कूकते हुए वह शायद कोयल से कह भी रहा था, “कूको, और कूको; फिर, पता नहीं, कूकने का कोई मौका मिले या नहीं। जब आग लग जाएगी इस धरती में, तब न कोई अमराई बचेगी और न किसी शाख पर बैठकर कूकनेवाली कोई कोयल...”
बगीचे से दौड़ता-भागता सहदेव भगत गाँव में घूसता है, और सामने मिल गए लोगों को सुनाता है, “मैं सुनन्दी साह के बगीचे में झाड़ा फिर रहा था। एक गाछ पर कोई कोयल कूक रही थी। देखता हूँ कि नकछेदी दास भी उस गाछ के नीचे खड़ा कोयल की कूक के जवाब में कूक रहा है, लगातार कूकता जा रहा है। अभी भी वहीं है नकछेदी दास; चलकर देखिए न।” क्या होगा जाकर देखने से! अब धरीछन ओझा भी उसे नहीं बचा सकते। अब मौत बिलकुल करीब आ गई है उस पगले के।
विद्यालय के मैदान में केहुनी के बल लेटा हुआ नकछेदी दास एकटक आकाश की ओर देखता है?...क्या देखता है वह?...उस वक्त नकछेदी दास शायद मैदान में नहीं होता, आकाश-गंगा में विचरता है, और वहीं से देखता है अपने गाँव सिमराही को; वह देखता है सुनन्दी साह के उस बगीचे को जिसके सारे के सारे गाछ उसके दादा ने रोपे थे, उस खेत-बहियार को जिसमें वह घूमने जाया करता था, उस पोखर को जिसमें हर वक्त कुछ लोग नहाते-तैरते रहते थे, उस कुएँ को जहाँ वह दिशा-मैदान के बाद हाथ-मुँह धोने आता था; वह देखता है सिमराही के उन नंग-धड़ंग बच्चों को जो खेतों-गलियों में गुल्ली-डंडा खेल रहे हैं, उन औरतों को जो आधा पेट खाकर जटा-जटिन खेल रही हैं, उन मरदों को जो होली के हुड़दंग में अपनी गरीबी छिपा रहे हैं; आम के उस बिरवे को जिसे एक पखवाड़ा पहले ही उसने विद्यालय के सामने रोपा था, और दीना मास्टर को जो विद्यालय के मैदान में अखबार पढ़-पढ़कर गाँववालों को खुशी और खुशहाली की खबरें सुना रहे हैं...नहीं-नहीं, कहाँ कुछ दिखाई पड़ रहा है! कुछ भी तो नहीं देख पा रहा है नकछेदी दास। धरती तो घोर अन्धकार में छिपी हुई है। वहाँ आग लगी हुई है और सारा आकाश धुएँ से भर गया है। नहीं दीखता है कोई सिमराही।
शून्य में एकटक क्या ढूँढ़ता है नकछेदी दास, गाँव में किसी को पता नहीं। उसके बारे में अगर कोई कुछ बता सकता है तो एक दीना मास्टर। उसके पास ही तो अभी भी बराबर जाता रहता है वह और बैठकर उनके साथ देर-देर तक बतियाता भी है। लोग पूछते हैं दीना मास्टर से, “क्या हुआ है नकछेदी दास को? आप तो जरूर जानते होंगे?”
दीना मास्टर मुस्कराते हैं और दोहा पढ़ते हैं,
“सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै।...”
क्या-क्या बोल रहे हैं दीना मास्टर, किसी की समझ में नहीं आता।
दीना मास्टर को भी कहाँ मालूम िक नकछेदी दास का असली दुःख क्या है! उसे भी नहीं पता कि इस बूढ़े को दैव लग गया है। क्यों न लगे दैव?...गाँव के ठाकुरजी को क्यों न हो गुस्सा इस नकछेदी दास पर? जब कभी शीश नवाया इसने ठाकुरवाड़ी में तो इस तरह जैसे कि ठाकुरजी से उसे कुछ लेना-देना ही न हो।...गंगा मैया ने तो अपने आँचल में बाँध ली थी वह बात जो कभी नकछेदी दास ने अपनी घरवाली से कही थी, “गंगा स्नान से कुछ नहीं होगा। सिमराही के पोखर का पानी गंगाजल से कम पवित्र नहीं है; यहीं नहा लो।”...
माँ चंडी का ऐसा अपमान कि कोई आदमी अपनी लुगाई को यह कहकर डाँट दें, “प्रसाद चढ़ाने जाना हो, तो जाओ; बकरा-पाठा चढ़ाने मैं तुम्हें चंडीथान जाने नहीं दूँगा।”...सिमराही के ऊपर से कभी शिव-पार्वती एक साथ गुजरे होंगे, तो शिवजी ने अवश्य कहा होगा पार्वती से, “इस सिमराही में एक है नकछेदी दास, भारी चांडाल। कौन नहीं आया होगा यहाँ से वरुणेश्वर मुझे जल चढ़ाने! मगर यह चांडाल कभी नहीं आया। तुम इसके लिए कभी मुझसे कुछ मत कहना; मैं इसे दंड दूँगा।”...कभी गुस्सा नहीं करनेवाला चेथड़िया पीर के पीर बाबा भी गुस्से में आ गए होंगे, “एक मुराद तो मैंने हर किसी की पूरी कर दी। जो भी आया मेरे पास, खाली हाथ नहीं लौटाया मैंने उसे। मगर तू नहीं आया, रे नकछेदी। सुख माँगने नहीं आया, सम्पत्ति माँगने नहीं आया, इतना घमंड कि एक औलाद तक माँगने नहीं आया, रे नकछेदिया!...”
दैव तो लग ही गया उसे—सोचता है नकछेदी—यह युद्ध क्यों?...सारा षड्यंत्र एक उसके ही विरुद्ध रचा जा रहा है।...इस निपुत्तर को कैसे तो अपने गाँव के सारे बच्चों से मोह हो गया है, जैसे कि सबके सब उसके ही नाती-पोते हों; तो फिर इन सारे बच्चों की उम्र छीन लो।...ईश्वर को चिढ़ाने चला है यह नकछेदिया, “नहीं दिया एक बेटा, तो क्या बिगड़ गया इस नकछेदी दास का? एक गाछ रोपकर जा रहा हूँ; मैं नहीं फला, मेरा यह गाछ फलता रहेगा।” लो, देखो अब कैसे फलता है तुम्हारा गाछ!...और सुनन्दी साह के बगीचे में तुम्हारे दादा के रोपे गए गाछ! बहुत फूलते हो न तुम उस पर? उसे पूरा का पूरा जला दिया जाएगा।...एक सुनन्दी दास का बगीचा ही नहीं, सिमराही के सारे गाछ-वृक्ष जलाकर राख कर दिये जाएँगे, ताकि मरने के बाद अगर तुम्हें स्वर्ग भी मिले, तो वहाँ भी तुम्हारी आत्मा तड़पती रहे स्वर्ग से भागकर सिमराही के किसी गाछ पर बसोबास के लिए।...खेत-बहियार में लहलहाती फसलों को देखकर कितना लहलहा उठता है तुम्हारा जी, जैसे कि सारे खेत-बहियार तुम्हारे ही हों! और, तुम सोच रहे हो कि मरने के बाद भी इन लहलहाते खेतों की हरियाली तुम्हें सुख पहुँचाती रहेंगी, तुम्हारी आत्मा को शान्ति पहुँचाती रहेगी। सुन, नकछेदिया, ये सारे खेत जल जाएँगे, कभी दूब भी नहीं जमेगी इस जमीन पर।...तुम्हारा पोखर जल जाएगा, तुम्हारा कुआँ जल जाएगा। अपनी आत्मा को सुख-शान्ति पहुँचानेवाली जिन-जिन चीजों की यादें साथ लेकर मरना चाहते हो, वे सारी यादें तुम्हारी आत्मा को तड़पाती रहेंगी, ऐसा इन्तजाम कर लिया गया है...
सचमुच एक उसी के विरुद्ध षड्यंत्र चल रहा है नियन्ता का।...
दीना मास्टर से पूछता है नकछेदी दास, “मास्टर बाबू, रूस और अमेरिका के राजा यह नहीं सोचते कि युद्ध उनके लिए भी बुरा होगा, बहुत ही बुरा?”
“यह डर उन्हें है जरूर,” दीना मास्टर जवाब देते हैं, “मगर जहाँ शंका, घृणा और अविश्वास का वातावरण है, और यह डर भी है कि कब दूसरा चढ़ बैठे, वहाँ तो कभी भी कुछ हो सकता है। ऐसे वातावरण में सुबुद्धि साथ छोड़ सकती है।”
“यह तो बहुत ही बुरा होगा, मास्टर बाबू।” बहुत मायूसी भरी आवाज में नकछेदी दास बोलता है।
दीना मास्टर खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं, “अब आपका क्या बुरा होगा, दासजी? बुरा तो होगा हमारे लिए कि अभी बहुत-कुछ बाकी है जिन्दगी में देखने-भोगने के लिए। आपने तो अपनी पूरी उम्र जी ली; आप मरे तो जग डूबा।”
“ऐसा क्यों कहते हें, मास्टर बाबू,” खिन्न मुस्कराहट के साथ बोलता है नकछेदी दास, “मर जाने भर से इस गाँव से नाता टूट जाएगा क्या? मरने के वक्त तो अब बस यही एक मुराद है कि मेरे बाद भी मेरा यह सिमराही इसी तरह बना रहे, हरा-भरा, भरा-पूरा। रूस और अमेरिका के राजा भी यह तो नहीं ही चाहते होंगे कि उनके मरने के बाद उनके देश बिला जाएँ।”
“जब आदमी की बुद्धि ठिकाने नहीं होती, तो वह कुछ भी सोच सकता है, कुछ भी चाह सकता है। मान लीजिए, उन दो में से कोई एक राजा भी अचानक ही पागल हो गया, तब फिर क्या होगा? एक आदमी की मरजी पर आज करोड़ों-अरबों आदमी जी रहे हैं; यह कितनी खतरनाक बात है! ऐसा तो नहीं है कि राजा पगला ही नहीं सकता। अगर वह पागल हो गया, तो? अब तो लोग ईश्वर से यह ज़रूर माँगें कि वे इन राजाओं की खोपड़ी सही-सलामत रखें।”
राजा पागल भी हो सकता है!—यह सुनते ही नकछेदी दास के पूरे बदन में झुरझुरी पैदा हो गई। सच ही तो, आदमी तो पागल हो ही सकता है। राजा भी तो आदमी ही होता है। नकछेदी दास को अपनी दादी से सुनी हुई कई कहानियाँ याद आ गईं जिनमें राजा पागल हुआ करता था। दादी ने उस वक्त ही कोई ऐसी कहानी तो नहीं सुनाई थी जिसका राजा अब पागल होनेवाला है! नकछेदी दास फटी-फटी आँखों से दीना मास्टर को घूर रहा था।
जब तक वहाँ बैठा रहा नकछेदी दास, दीना मास्टर एक ही बात बार-बार कहते रहे, “जो विपत्ति पूरी धरती पर है, दासजी, उसके लिए उदास मत होइए, भगवान से मनाइए कि वह सबकी रक्षा करे।”
जब चलने को हुआ नकछेदी दास, तो उसने पूछा, “आप भगवान में विश्वास करते हैं, मास्टर बाबू?”
सिमराही से तीन कोस का रास्ता है चेथड़िया पीर का। पीपल के गाछ पर पीर का वास है। बस, एक चिथड़ा चाहिए पीर बाबा को; इतने से ही माँगनेवाले की मुराद पूरी हो जाती है; गोद भर जाती है, घर भर जाता है। जब किसी का आसरा नहीं, तब एक इस पीर बाबा का ही आसरा है।
असंख्य चिथड़े लटके हुए हैं, इस गाछ से; रोज-रोज बढ़ते ही जा रहे हैं। पूरे इलाके का देवता है यह पीर बाबा। सिमराही में ऐसा कोई नहीं जो पीर बाबा के पास अपनी मुराद माँगने नहीं आया हो; एक बचा हुआ था, आज वह भी जा रहा है उनके पास।
एक बूढ़ा जो अब जमीन का पैबन्द बनने को है, एक बूढ़ा जिसे छोड़कर उसकी बाँझ बीवी भी परलोक सिधार गई है, एक बूढ़ा जिसने समय रहते ईश्वर से भी कभी कुछ नहीं माँगा, एक बूढ़ा जो अपना परलोक सुधारने के लिए भी कभी देवी-देवताओं के पास नहीं गया, आज क्या माँगने जा रहा है पीर बाबा के पास?
नकछेदी दास तो घर-घर सुना आया है कि एक ऐसा युद्ध होनेवाला है जिसमें सारी धरती जल जाएगी और अपना सिमराही भी नहीं बचेगा, कि गाँव के सारे लोगों को चलकर पीर बाबा से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि यह युद्ध नहीं हो, धरती नहीं जले, सिमराही को नहीं लगे कोई आँच। उसने ढिंढोरा पीट दिया है पूरे गाँव में, “मैं पीर बाबा के पास जा रहा हूँ; जिसे चलना हो मेरे साथ चले।”
यह दीना मास्टर जो न कराए। एक बूढ़े आदमी को खिलौना बना लिया है। कुछ पूछने भी जाओ, तो मुस्कराकर दोहा पढ़ने लगेंगे, “सुखिया सब संसार है, खावै और...” उस मुस्कराहट से तो नहीं लगता कि धरती जल जाएगी। आग लगेगी धरती में, तब क्या दीना मास्टर शिवजी के त्रिशूल पर जा बैठेंगे? एक भले-चंगे आदमी को पागल बना दिया है इस मास्टर ने।
पागल नहीं, ढोंगी है यह नकछेदी दास। जिसकी पूँछ निकलने ही वाली है, वह परलोक की सोचेगा या इस लोक की? इस गाँव के लिए खाक माँगेगा वह पीर बाबा से! ढोंग-ढोंग!...गया होगा अपने परलोक के लिए ही...मगर अपने साथ पूरे गाँव को क्यों कह रहा है चलने के लिए?...यह पगला नहीं ढोंगी ही है।
पीर बाबा के पास अकेला ही जाता है नकछेदी दास। इस पागल के साथ कौन जाए! देवी-देवता के साथ दिल्लगी ठीक नहीं।
गपड़चौथ में शरीक औरतों को पिपराहीवाली ने सुनाया, “नकछेदी बूढ़ा आज चेथड़िया पीर गया है।”
“गया होगा बेटा माँगने।” हँसते हुए भगता की माँ बोली।
“ऐसा बौराह नहीं देखा,” मुँह चमकाकर कहा पिपराहीवाली ने, “जो जोरू मर गई तब बेटा माँगने गया।”
“बौराह नहीं है,” फिर हँसकर बोली भगता की माँ, “गया है बेटा माँगने ही; मगर पहले पीर बाबा से अपनी बुढ़िया वापस माँगने गया है।”
इस बार सरपंच हरिकिशोर सिंह ही हँसते हुए पूछते हैं मोती बाबू से, “क्यों, मोती बाबू, आपने नकछेदी को बताया नहीं था कि बलात्कार की सजा बीस साल की कैद है?”
“हाँ, बताया तो नहीं था,” अकबका जाते हैं मोती बाबू, “मगर हुआ क्या? कुछ हुआ है क्या?”
“हुआ नहीं है, मगर कुछ जल्दी ही होगा। सुना नहीं कि नकछेदी चेथड़िया पीर गया है?”
“सुना तो है, मगर उससे...”
“वहाँ से आकर टंट-घंट करेगा। दिन शिवालय में गुजारेगा और रात ठाकुरवाड़ी में। फिर किसी दिन चिमटा-कमंडल के साथ धूनी रमाएगा, अपने गाँव में नहीं, तो किसी और गाँव में; और कन्याओं को आशीर्वाद देना शुरू करेगा पुत्रवती-सौभाग्यवती होने का।”
मोती बाबू जोर से खिलखिला पड़ते हैं।
“क्यों मुखियाजी,” सिर को आगे-पीछे हिलाते हुए मुस्कराकर बोलते हैं मानिकलाल, “मेरी बात सच उतरी या नहीं? मैंने कहा था न कि नकछेदी दास मुखिया बनने का सपना देख रहा है।”
“पीर बाबा के पास जाने भर से मुखिया नहीं बन सकता कोई माई का लाल।” ऐंठकर जवाब देते हैं मुखियाजी।
“पीर बाबा को नहीं, गाँव के लोगों को जगा रहा है वह। गाँववाले के मन में यह बात तो आ ही गई होगी कि एक अकेला नकछेदी दास ही पूरे गाँव की भलाई की बात सोचता है। सावधान हो जाइए अभी ही, नहीं तो पटकनिया खा जाइएगा।”
“चुप भी रहिए,” रोब दिखाते हैं रामबुझावन राय, “मेरी आँधी में इस बगुले का क्या ठिकाना रहेगा।”
पीर बाबा से क्या माँगा नकछेदी ने, सही-सही किसी को नहीं मालूम। एक दीना मास्टर ने ही तीन कोस दूर सिमराही के विद्यालय के मैदान में अखबार पढ़ते हुए स्पष्ट सुनी थी चेथड़िया पीर को चिथड़ा चढ़ाते नकछेदी दास की बुदबुदाहट, “हे पीर बाबा, इतनी विनती है, कोई राजा कभी पागल न हो।” सिर्फ बुदबुदाहट ही नहीं सुनी दीना मास्टर ने, यह भी देख लिया कि चिथड़े की तरह अपनी आत्मा को लटका दिया नकछेदी दास ने पीपल के गाछ से।
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