1.
क्यों मेरा नाम लिया जायेगा?
कभी मैं सोचता था : सुदूर युगों में
जब जिन घरों में मैं रहता हूँ, खँडहर हो चुके होंगे
और जिन नावों में मैं घूमता हूँ सड़ चुकी होंगी
तब भी मेरा नाम लिया जायेगा
औरों के साथ में।
क्यों कि मैं ने जो उपयोगी था उसे सराहा—जिसे
मेरे ज़माने में घटिया समझा जाता था;
क्यों कि मैं सब धर्मों से जूझा;
क्यों कि मैं ने अत्याचार के विरुद्ध युद्ध किया, या
किसी और आधार पर;
क्यों कि मैं ने जनता का साथ दिया, और
उन्हें सब सौंप दिया, या उन्हें मान दिया,
क्यों कि मैं ने कविता लिखी और भाषा को समृद्ध बनाया,
क्यों कि मैं ने व्यावहारिक काम सिखाये, या
किसी और आधार पर;
इसी से मैं ने माना, मेरा नाम भी ज़रूर लिया जायेगा
एक शिला पर
मेरा नाम लिखा रहेगा, पुस्तकों में से
वह नयी पुस्तकों में मुद्रित होता रहेगा।
पर आज
मैं ने समझ लिया कि वह बिसरा दिया जायेगा।
क्यों कोई नानबाई से माँगने जायेगा अगर रोटी काफ़ी रखी होगी?
क्यों कोई सराहेगा उस बर्फ़ को जो पिघल चुकी
जब नया हिमपात सामने होगा?
क्यों कोई अतीत होना होगा अगर
कोई भविष्य है?
क्यों मेरा नाम लिया जायेगा?
***
2.
डाकू और उस का पट्ठा
हेस्से के प्रान्त को लूट रहे थे दो डाकू
कई बिचारे किसानों का नाप चुके थे कल्ला।
उन में एक था भूखे भेड़िये-सा दुबला
पर दूसरा था पोंगे-पादरी-सा मुटल्ला।
उन की देह की गठन में भेद का कारन था।
एक मालिक था, दूसरा उस का पट्ठा।
मालिक दूध से उतार लेता था मलाई, तभी
पट्टे तक पहुँचते दूध हो जाता खट्टा।
किसानों ने दोनों डाकुओं को घेर लिया
दोनों के लिए बना एक ही रस्सी का छल्ला।
लटका एक जैसे हो भूखा भेड़िया दुबला—
और दूसरा, जैसे पोंगा-पादरी मुटल्ला।
किसान खड़े ताकते, बलाएँ टालते रहे,
दोनों को घूरते रहे। यह कोई समझाये—
मोटा आदमी तो डाकू था, मान लिया—
पर दुबले को कैसे वही माना जाये?
***
3.
जनरल, तुम्हारा टैंक एक तगड़ा वाहन है
जनरल, तुम्हारा टैंक एक तगड़ा वाहन है।
वह रौंद देता है एक पूरे वन को
और कुचल डालता है सैकड़ों मनुष्य।
पर उस में एक कसर है :
उसे दरकार है एक चालक की।
जनरल, तुम्हारा बममार विमान तगड़ा है
तूफ़ान से भी तेज़ चलता है
और हाथी से अधिक ढो ले जाता है।
पर उस में एक कसर है :
उसे दरकार है एक यान-चालक की।
जनरल, मनुष्य बड़े काम का जीव है :
वह उड़ सकता है और वह मार सकता है।
पर उस में एक कसर है :
वह सोच सकता है।
***
4.
चक्का-बदल
मैं बैठा हूँ सड़क के किनारे
चालक बदल रहा है चक्का।
मुझे न वहाँ से लगाव है जहाँ से मैं आ रहा हूँ,
न मुझे वहाँ से लगाव हैं जहाँ मैं जा रहा हूँ;
क्यों फिर मैं उसे चक्का बदलते देख रहा हूँ
इतनी बेचैनी से?
***
5.
धुआँ
छोटा-सा घर
पेड़ों तले
ताल के किनारे।
छत से उठ रहा धुआँ।
वह न होता
तो कितने उदास दीखते
घर
पेड़
और ताल!
***
6.
अलूचे का पेड़
अलूचे का पेड़ एक आँगन में खड़ा है—
छोटा, उसे पेड़ मानना मुश्किल बड़ा है।
घिरा है चारों ओर बाड़ से
बचा है लोगों की लताड़ से।
छोटा है, कोई उपाय नहीं कि बड़ा हो—
हाँ, बड़ा हो, ऊँचा हो कर खड़ा हो।
कैसे वह पाये जम
धूप मिले जब इतनी कम!
फल तो कभी आता नहीं, फिर अलूचे का पेड़ है
यह कोई कैसे मान ले?
पर है नर अलूचे का ही पेड़—
कोई पत्ती से पहचान ले!
(ये अनुवाद ‘नया प्रतीक’ के मार्च 1978 अंक में छपे थे। पुस्तक-रूप में अब तक अप्रकाशित हैं। पीयूष दईया ने खोजे हैं।)
[ओम थानवी की एक पुरानी फ़ेसबुक पोस्ट से साभार]