दो-तीन महीने पहले मैंने एक किताब के लिए संस्मरण लिखा। किताब आई नहीं तो मैंने उन्हें भेज दिया। जाने मन में क्या उथल-पुथल मची हुई थी। उन्हें मिल कर कभी अपनी भावुकता प्रकट नहीं कर पाई थी। उन दिनों वे बहुत बीमार थे और बेड पर पड़े पड़े बात कर रहे थे। दरकी हुई आवाज़ थी। पता नहीं मेरा संस्मरण वे पूरा पढ़ पाए या नहीं, उनकी मेरी आख़िरी बात यही थी―“गीता, तुम इतना सब सोचती हो मेरे बारे में… मैं ज्यादा बोल नहीं सकता। मेरा स्नेहाशीष लो।”
उन्होंने उस हालत में भी कहा कि तुम्हारी जिस कहानी की चर्चा हो रही है, उसे पढ़ना चाहूँगा।
दो दिन बाद मेरे व्हाट्सऐप पर कहानी पर उनकी प्रतिक्रिया आई। मैं सुखद आश्चर्य से भर उठी। जो इंसान इतना बीमार है, साँसें उखड़ रही हैं, वो अभी भी पढ़ रहा है, लिख रहा है।
कथाकार मित्र कमलेश जी उन्हीं दिनों उनसे मिलने गए होंगे। वहाँ से मिल कर लौटे तो मुझे मैसेज किया―“परसों अवधेश प्रीत सर के घर गया था। तकरीबन चार घंटे की बैठकी लगी। अस्वस्थ होने के बावजूद वह जिस तरह पढ़ रहे हैं वह अद्भुत है। इस चार घंटे की बैठकी में उन्होंने हाल में पढ़ी कई कहानियों की चर्चा की। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा शिद्दत से उन्होंने आपकी कहानी ‘दमनक जहानाबादी की विफल गाथा’ के बारे में बात की। लगभग आधे घंटे तक वे आपकी इस कहानी पर बोलते रहे। उनका कहना था कि गीताश्री के पास अनुभवों का समृद्ध संसार है और वे इनका जिस तरह रचनात्मक उपयोग करती हैं वह नये लेखकों को सीखना चाहिये। छोटी घटना से शुरू होने वाली कहानी भी किस तरह बड़े फलक की बन जाती है यह गीताश्री के हुनर के चमत्कार से संभव हो पाता है।”
इसे पढ़ते ही मैंने फ़ोन लगाया। मुझे क्या पता कि उस दिन फ़ोन नहीं उठा तो कुछ दिन बाद फिर कभी नहीं उठेगा। वो आवाज़ गुम हो गई, जो टूट रही थी, डूब रही थी लगातार और वो मुझे ढाँढ़स बँधा रहे थे कि ठीक होते ही मिलेंगे।
जाने वाले भी झूठा वादा कर जाते हैं। वे नहीं जानते कि जो यहाँ छूट जाता है, उस पर क्या बीतती है।
जो आज गुज़र रही है मुझ पर…वो सिर्फ़ मैं जानती हूँ।
और हाँ… मैंने सुना है, लेखक का एक जीवन मृत्यु के बाद शुरु होता है। तो हमारे प्रिय कथाकार अवधेश प्रीत हैं और रहेंगे।
“थे?” नहीं! उनसे प्रीत हमेशा रहेगी। यकीन नहीं करना चाहती कि महेंद्रू, पटना का वह सुमति पथ सूना हो गया है।
वो पथ होगा, वो भर भी, पीछे गंगा चुपचाप बह रही होगी, रानी घाट पर कुछ लोग बैठे होंगे, बेख़बर कि इस मकान से अभी-अभी कोई बड़ा मनुष्य चला गया है।
सबकुछ होगा वहाँ, बस वो दो जोड़ी आँखें न होंगी, बाहर अपनों का इंतज़ार करती हुई।
इस संस्मरण को उसी लिहाज़ से पढ़ा जाना चाहिए।
***
एक स्त्री किसी पुरुष में क्या पसन्द करती है या उसे कैसा पुरुष चाहिए?
शायद एक जवाब यह भी हो सकता है―“वो जो किसी स्त्री के प्रति आदर और बराबरी के भाव से भरा हो, किसी स्त्री को तब भी सम्मान दे जब स्त्री कुछ न हो। जिस नज़र से किसी पुरुष को देखता हो, उसी नज़र से स्त्री को देखता हो।”
मुझे उनके जीवन की जो बात सबसे अधिक आकर्षित करती रही है शुरु से वो है स्त्री के प्रति उनका अलग नजरिया। जब हम उनसे मिले थे, तभी हमें पता चला था कि अवधेश जी गैर-बिहारी हैं। उत्तर प्रदेश के किसी शहर से पटना नौकरी करने आए, एक लड़की से प्रेम हुआ और उसके बाद फिर कभी लौट कर अपने शहर न जा सके। लौटना होता तो नौकरी बदल सकते थे। पत्नी पर जोर डाल कर साथ चलने कहते या लंबी दूरी का रिश्ता रख सकते थे। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उनकी प्रेमिका-पत्नी जो हम सबकी भाभी हैं, वो हमेशा पटना में, अपने उसी पुराने घर में रहीं। अवधेश जी आज तक साथ हैं। उस जमाने में ऐसा कहाँ होता था? आज मैं हॉलीवुड मूवीज़ में देख रही हूँ कि लड़की के प्रेम में लड़के अपना शहर, देश छोड़ रहे, प्रोफ़ेशन छोड़ रहे और वहीं बस जाते हैं जहाँ उनकी प्रेमिका रहना चाहती है। लड़कियाँ अपना देस, अपनी जगह नहीं छोड़ना चाहतीं। लड़के काफ़ी तनाव और आत्मसंघर्ष से गुज़र कर समझ जाते हैं कि उनके लिए सबसे जरुरी प्रेम है। अब तक लड़कियों ने सबकुछ छोड़ा। वक्त बदल गया है, अब तो लड़के भी समझे इस त्याग को। लड़के समझने लगे हैं, यह इस सदी की फ़िल्मों में देख रही हूँ। अब तक लड़कियों की विदाई ही देखता रहा है ज़माना।
मुझे जब ये बात पता चली थी तभी बहुत रोमांचक लगी थी। अवधेश जी हमारी नज़र में हीरो बन गए थे। जानती हूँ कि लोग और भी कुछ कहते होंगे। ना कहें तो लोग कैसे। लेकिन ये कम बड़ी बात है क्या?
अपनी जगह छोड़ कर किसी और शहर में बस जाना, अपने चुने हुए परिवार की ख़ातिर। मैं तो तब सोच भी नहीं सकती थी कि किसी लड़की के जीवन में ऐसी क्रांति हो सकती है कि उसे ससुराल में न बसना पड़े। जिसका अपना घर न छूटे न छिने। अपने घर में मेहमानों की तरह न पले, जैसे हम सब पले।
हमारे हाथ खाली हैं… बस इतना संतोष है कि हमने तीसरा जहाँ बसाया। पहली और दूसरी दुनिया छोड़ कर।
मैं सोचती थी तब कि भाभी का भाग्य कितना सुंदर है। और अवधेश जी कितने साहसी। न ज़माने की परवाह की न अपने शहर-ख़ानदान की। बसे तो गंगा किनारे, अपने प्रेम के लिए। अपने प्रेम को किसी स्त्री के लिए घुटन बनने से बचा लिया। अपने पुरुषोचित अधिकार को पहले झटक दिया। एक स्वतंत्रचेता स्त्री पर आधिपत्य की कोशिश नहीं की। ये बात मुझे बहुत आकर्षित करती थी। आज भी करती है। जब किसी पुरुष की स्त्रियों के प्रति सम्मान का भाव देखती हूँ।
उनकी यही जीवन दृष्टि, स्त्रियों के प्रति सोच उनकी कहानियों और उपन्यासों में दिखाई देती है। कोई फाँक नहीं है।
जब सोच व्यवहार में परिणत न हो, क्या फ़ायदा? रचनाओं में स्त्री के प्रति संवेदनशीलता का ढोंग करने वाले जीवन में अत्यंत कटु देखे गए हैं।
अवधेश जी अलग हैं। सबसे अलग। वे उन गिने चुने लेखकों में से एक हैं जिनसे मिल कर कभी जेंडर का अहसास नहीं होता।
मेरा अनुभव आज का नहीं है। कुछ ही लेखक हैं जिन्होंने मुझे कॉलेज के दिनों में देखा है। मैं मुजफ्फ़रपुर में होस्टल में रहती थी और अपने विश्वविद्यालय में खूब साहित्यिक आयोजन कराती थी। युवा साथियों की एक मंडली थी―साहित्य कुंज, जिसकी मैं जिला सेक्रेटरी थी। हम शहर में भी खूब आयोजन कराते थे। ये अस्सी के दशक का आख़िरी साल थे।
शहर में आयोजन होते तो पटना से लेखक-कवि बुलाए जाते। हमारी मंडली के उत्साही साथी उन्हें आमंत्रित करने पटना जाते, सभी बड़े लेखकों से मिलते। उस दौरान मैं सबसे मिली थी। मुझे तो याद है, उन्हें याद हो न हो।
जब अवधेश जी से मिलीं, घर पर। भाभी भी मिलीं। और दोनों ने मुझे ऐसा बाँधा, ऐसे अपनाया कि पटना में उनका घर मेरा घर हो गया। गंगा किनारे, एक गली में उनका घर आज भी सबके आकर्षण का केंद्र है। उनके आँगन में खड़े होकर गंगा का अपार विस्तार देख सकते हैं। परिवेश का असर स्वभाव पर पड़ता है। मुझ जैसी अनजान, अज्ञातकुलशील छात्रा को स्थापित लेखक का ऐसा स्नेह, घरेलू आत्मीयता दुर्लभ थी, मुझे मिली। जब भी पटना आती, पटना की वह गली खींचती हुई उनके घर पहुँचाती। हक़ से वहाँ रुकती। उस समय अवधेश जी कथा और पत्रकारिता में एक स्थापित नाम थे। हम जैसों के लिए और बड़ी चीज़। बड़े लेखकों का रवैया हमने तब भी झेला था। उस भीड़ में अकेला एक लेखक हम युवाओं को घर पर रोकता, ठहराता, खाना खिलाता और गप्पें मारता, रचनाएँ सुनता और सुनाता। क्या ही रचनात्मक माहौल होता था। हम सब रचनाएँ सुनाते, वो हमें सलाहें देते, हम गौर से सुनते। वे हमारी रचनाएँ भी छापते और हमारे आयोजन की ख़बरें भीं।
मेरी जो साहित्य और पत्रकारिता की छवि बनी, उसमें अवधेश जी की संगति का प्रभाव पड़ा। पढ़ाई पूरी करके मैं दिल्ली आ गई पर हम वैसे ही जुड़े रहे। पटना जब भी जाती, उस गली में मुड़ती जरुर। चाहे उनसे मिलने उनके अख़बार के दफ़्तर में जाना हो या घर पर। बिना मिले लौटना कम ही बार हुआ।
मोबाइल ने हमारी दूरियाँ कम की, संवाद स्थापित हुए और सोशल मीडिया ने और क़रीब ला दिया। बीच का गैप ख़त्म हुआ। हम संपर्क में रहे और आज तक हैं। इतने लंबे संबंध चले, वो भी इस भयानक दौर में, चकित होती हूँ। इसमें मेरा योगदान कम, अवधेश जी का ज्यादा है। मैंने उन्हें कभी किसी रिश्ते में नहीं बाँधा। वो हमारे साथ दोस्ताना रहे। हम सभी युवा साथी उनके साथ दोस्ताना रहे। उनका व्यवहार वरिष्ठ जैसा नहीं रहा जिसमें वरिष्ठता का दंभ झलकता हो या अपनी श्रेष्ठता का गुरुर। हमने कईयों में देखा है। लेकिन अवधेश जी हम युवाओं के दोस्त हैं। उनके दोस्ताना व्यवहार ने ही हम सबको उनसे आज तक जोड़े रखा है।
बल्कि जहाँ-जहाँ जब भी उनके सपोर्ट की हमें जरुरत हुई, उन्होंने बिना शर्त दिया। हम युवाओं की प्रतिभा पर वैसा भरोसा कौन देता है?
हमारे संबंध का एक लंबा दौर बीत चुका है। कितनी बातें, कितनी घटनाएँ याद आ रही हैं। उन सबको याद करती हूँ तो एक सौम्य, आत्मीय चेहरा उभरता है। खुरदुरी भारी आवाज़ में उनकी कहानियाँ सुनते-सुनते हम सिहर उठते थे। मुझे याद है, “नृशंस” कहानी का पाठ हमने सुना था, हमारा रोम-रोम सिहर उठा था। इस एक कहानी ने हमें उस समय भीतर से बदल दिया था। कच्चे मन पर ऐसी छाप पड़ी कि आज तक सिहरन बाकी है।
तब हमारी समझ बन रही थी। हम खूब पढ़ रहे थे और वरिष्ठों को मंचों पर सुन रहे थे। उनकी संगति में भी बहुत समझ बनती और खुलती थी। उस दौर में मैं कवि थी लेकिन कथाकार अवधेश प्रीत की संगति ने कथा-संसार के दरीचे खोले। हमने उनकी चर्चित कहानियाँ पढ़ीं, उन पर बातें कीं।
उनके साथ उनके घर पर हुई एक गोष्ठी याद है। हम सब साहित्य कुंज की मंडली पटना पहुँचे थे और अवधेश जी हमेशा की तरह हमारे मेजबान बने। उस गोष्ठी में कथा पाठ और चर्चा हुई। हम सब छात्र थे, रमेश, सुजीत, संजय, शैलेश एवं अन्य। आज ये सब स्थापित नाम हैं। हमारा बैच अच्छा निकला। क्योंकि हमने अपने शहर में वरिष्ठ लेखकों की संगति की और पटना की यात्रा खूब की। हमारे भीतर ललक थी। ये सब हमारे नायक थे। हमारे भीतर वरिष्ठों की धाक थी और मिलने में हिचक थी। जिन्होंने हमें उम्र से, हैसियत से परे जाकर अपनाया, हम उनसे बँधे और आज तक बँधे हुए हैं।
अवधेश जी उनमें से एक हैं जिनकी संगति उम्र के अहसास से परे हैं। वो दोस्त हैं, गाइड हैं। वो कमियाँ भी बताते हैं तो इस भाव से कि हमें बुरा न लगे। हमारे भीतर कमतरी का अहसास न हो। उन्हें मैंने अपनी उपलब्धियों पर हमेशा खुश होते देखा है। कुछ मुद्दों पर मैं लड़ी तो तुरन्त हार मानते देखा है। तुरन्त उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है। चाहे वह गलती न हो, साधारण-सी चूक हो। बराबरी का मान देना उन्हें खूब आता है।
हमारे बीच कुछ सालों की संवादहीनता भी रही। उसकी वजह हम सबकी व्यस्तताएँ थी। लंबा अंतराल कई बार अच्छे ख़ासे संबंधों में भी दरारें डाल देता है जो कष्टदायी होती है। हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ। हम जहाँ छूटे थे, वहीं मिले। बल्कि अवधेश जी में और अधिक उत्साह भरा हुआ था और मुझमें कुछ संकोच आ गया था। अपनी कविताएँ छात्र जीवन में बेधड़क उन्हें पढ़ाया सुनाया करती थी। अब वो बात नहीं रही। मेरे भीतर अजीब-सा संकोच भर गया था या कहें कि आत्मविश्वास की कमी और बड़े लेखकों का ख़ौफ़ भर गया था।
अवधेश जी सालों बाद भी नहीं बदले थे। उनमें वही सहजता, उदारता और दोस्तानापन बचा हुआ था जो हमें छात्र जीवन में मिला था। बल्कि वे मेरी हर किताब पढ़ना चाहने लगे। वे खुश थे कि मैंने इतना काम कर लिया। इतना लिख लिया। वो खुल कर मेरी प्रशंसा करने लगे। यही नहीं, मेरी किताबें मँगाई और उन पर समीक्षा भी लिखी। ऐसा कौन वरिष्ठ करता है? मैं तो ऐसे वरिष्ठों को जानती हूँ जो हमारी किताबों पर पाँच लाइन लिख कर हमें धन्य करने के भाव से भरे रहते हैं। ऐसे दौर में अवधेश जी ने मेरी ही नहीं, मेरी पीढ़ी के कई लेखकों की किताबों की समीक्षा की। मैंने पढ़ा, देखा। बल्कि लाइव में भी आकर किताबों पर बात की।
साहित्य में वरिष्ठता एक भयानक रोग है। कई बार यह बोध संवेदनशील और उदार मनुष्य होने से भी वंचित कर देता है। अवधेश जी इस बीमारी से बचे रहे। कोई दंभ नहीं। उनके भीतर के पत्रकार ने उन्हें ऐसा बनाए रखा। मैंने उनकी इस उदारता को अपने भीतर भर लिया है। शायद हम दोनों को हमारे पेशे ने, पत्रकारिता ने बहुत मदद की। हमारी नज़र में कृति बड़ी होती है, रचनाकार सीनियर जूनियर नहीं। न अहं न संभ्रम। लेखन तो दुनिया से दोस्ताना संबंध बनाने का उपक्रम है। जहां गैर-बराबरी खत्म होती है। उम्र का रचना की श्रेष्ठता का कोई संबंध नहीं। कई बुजुर्ग लेखकों ने बड़ी हल्की कृतियाँ दी हैं। कई युवाओं ने परिपक्व कृतियाँ लिखीं। अवधेश जी ने बिना कुछ कहे, मुझे ये पाठ पढ़ाया।
मैंने लगातार बाद की पीढ़ी के लेखकों पर लिखा। अवधेश जी ने यहाँ भी अनजाने ही कुछ सिखाया और बेहतर मनुष्य बनाया।
अवधेश जी के लेखन के बारे में क्या कहूँ। उनकी हर कहानी पढ़ना मेरा कर्तव्य, मेरा पसंदीदा काम। उनके उपन्यास पढ़कर लिखना मुझे पसंद। मेरे लिए व्यक्ति का चरित्र-स्वभाव उसकी कृति से पहले है। अब मैं सतर्क हूँ। कुछ भी नहीं पढ़ लेती। लेखक को व्यक्तिगत तौर पर पसंद करती हूँ तो उनकी हर कृति पढ़ूँगी। अपनी प्रतिक्रिया दूँगी। अनजान लेखकों को भी पढ़ती हूँ, मगर लेखक से कभी मिलने की आकांक्षा नहीं पालती।
मुझे याद है, “चाँद के पार चाबी” कहानी पढ़ने के बाद मैं कई दिन तक सिहरती रही। आज तक भूल नहीं पाई हूँ। जब भी कोई कहानी बहुत झकझोरती है तो लेखक से बात करने का मन होता है।
मैंने फ़ोन पर ही उनसे पूछा था कि यह कहानी कैसे संभव हो पाई? यह किरदार कहाँ मिला आपको?
उन्होंने मुझे काफ़्का का एक कोट सुनाया―“एक क़िस्सागो अपने क़िस्से के बारे में कुछ नहीं बता सकता…वह क़िस्सा कहता है या चुप रहता है। उसकी दुनिया या तो अंदर धड़कती है या ख़ामोश हो जाती है।” इतना कह कर वे चुप हो गए थे।
मैं कहना चाहती थी कि कहानी अपने अनुभवों के कच्चे माल से ही तो बनती है। बिना पूछे खुद बोले। शायद कहानी पर चर्चा ने उन्हें अत्यधिक भावुक कर दिया होगा जैसा आजकल मेरे साथ होता है। वे बोले―“मेरी कल्पना यथार्थ की दीवारों पर सिर फोड़ती रहती है…तब कहीं किरदार खुद बख़ुद सामने आ जाते हैं। ये जो मामूली लोग हैं, वो हमारे सपनों से बाहर यथार्थ की दीवारों पर उग आते हैं…तब गैर-मामूली हो उठते हैं।”
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और लंबा लिखा था। उन्हें इतना ही भेजा। कट पेस्ट किया था। मुझे ये भी लिखना था कि उनके स्त्री पात्रों से मेरा स्वभाव बहुत मैच करता है। ये भी लिखूँगी। स्मृतियाँ साथ देंगी।
अपने उदासी के इन दिनों में मुझे बस इतनी तसल्ली हुई कि उनके जीते जी मैं अपनी भावनाएँ उनके सामने प्रकट कर पाई।
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