विनोद कुमार शुक्ल  धरती पर खड़े होकर आकाश का दरवाज़ा खटखटाते हैं

विनोद कुमार शुक्ल के कविता संग्रह 'आकाश धरती को खटखटाता है' पर वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन की टिप्पणी

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हिन्दी कविता की समकालीन परंपरा में विनोद कुमार शुक्ल उस नगण्य संवेदनशीलता के कवि हैं, जिन्होंने न केवल नई संवेदनाओं को अंकुरित किया, उन्हें आलोचना के स्तरों से परे जाकर भी मान्यता दिलाई। उनकी काव्य-यात्रा किसी वैचारिक घोषणापत्र से संचालित नहीं होती। वह अपने सघन, मौन और आत्मालाप से उठे उच्छवासों में डूबे अनुभवों की नदी में उतरकर उस पार पहुँचने का जोखिम उठाती है।

अभी मैंने उनकी कविताएँ पढ़ी हैं। राजकमल प्रकाशन से आई उनकी पुस्तक अनूठी है। वैसा मितकथन और पारदर्शिता दुर्लभ है। 'आकाश धरती को खटखटाता है' उनके काव्य-संसार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें शुक्ल की वही विशेषता मुखर है, जिसमें वे न्यूनतम शब्दों से गहनतम अर्थ रचते हैं। उनके यहाँ मितकथन मात्र भाषा का संयम नहीं, संवेदना का घनत्व है। यह घनत्व पाठक को हर बार ठहरकर सोचने के लिए बाध्य करता है। यह घनत्व कुछ ही कवियों में मिलता है। 

यह कवि समय के भीतर और पार उतरता है। यह संग्रह अपने समय में गहरे धँसा हुआ होते हुए भी समयातीत दिखता है। कविता यहाँ समकालीन जीवन के यथार्थ से उपजती है, लेकिन उसमें किसी शाश्वत खोज की गूँज है। शुक्ल की भाषा पारदर्शी और सूक्ष्म है, जो पहली दृष्टि में जटिल लग सकती है, पर वास्तव में उसका आधार सरल और आत्मीय है। 

मैं सबसे पहले तो इसके शीर्षक के ही रूपक से मोहित हुआ और इसे अमेज़न से मंगवाया। 'आकाश धरती को खटखटाता है' अपने आप में एक विराट् रूपक है। यह केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं, मनुष्य और उसके ब्रह्मांडीय अनुभव का संकेत है। ऊपर से आता आकाश का आह्वान और नीचे की मिट्टी का उत्तर। इस रूपक में कवि की गहरी दार्शनिक दृष्टि और संवेदनात्मक व्यग्रता समाहित है।

विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी कविता में उन विरले रचनाकारों में हैं जिनकी कविता 'आकाश' की तरह ऊँचाई छूती है और 'धरती' की तरह अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। 'आकाश धरती को खटखटाता है' केवल कविताओं का संग्रह नहीं, हमारी संवेदनाओं के द्वार पर आकाश का दस्तक देना है।

वाक़ई मैं अभी प्रभात का कविता संग्रह पढ़कर और उस पर बहुत लंबा लिखकर हटा, जो अभी कहीं भेजा नहीं है तो अचानक ही इस काव्य पठन में विनोदकुमार शुक्ल की कविता कलात्मक संतुलन का तो बोध कराती ही है, वह चीज़ों को समझने का एक नया और संवेदनशील नज़रिया भी देती है। प्रभात की कविताओं के बाद यह एक अनूठा और अलग अनुभव था। प्रभात का कविता संग्रह 'अब के मरेंगे तो बदली बनेंगे' निबंध प्रकाशन से आया है और वह नई ज़मीन तोड़ता प्रतीत होता है।

 

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