प्रिय मित्र अवधेश प्रीत की स्मृति में

जिन्दगी के किसी मोड़ पर कोई ऐसा मिलता है जो जीवन का हिस्सा बन जाता है। वह केवल मित्र ही नहीं होता वरन हमारा सहयात्री भी बन जाता है। ऐसा सहयात्री जिसका साथ, सहयोग और उपस्थिति हमारे दिलों में विशेष उर्जा भर देती है। ऐसे ही थे सहज, सरल व उदार स्वभाव के प्रिय मित्र अवधेश प्रीत...

35 वर्ष पूर्व मेरे पहले काव्य-संग्रह ‘दरीचे’ का अनुग्रह नारायण शोध संस्थान पटना में हो रहे विमोचन के अवसर पर मेरी उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी जो कभी आख़िरी नहीं बनी। उनके प्रति आकर्षण का कारण था मुझ जैसी नवोदित कवि की रचनाओं पर उनका ईमानदारी से बोलना। रचनाओं के मर्म को उद्धाटित करना जो अमूमन साहित्य जगत के आचरण के विपरीत था।

उनकी मित्रता ने मुझे सच्चे अपनेपन और निस्वार्थ स्नेह का अर्थ सिखाया। हमारी मित्रता पहाड़ी नदी समान सदैव एक लय में बहती रही। ना कभी उफनायी और ना ही कभी शुष्क हुई।

एक पत्रकार और कथाकार होने के नाते उनके पास अनुभवों का व्यापक संसार था जिस पर हम अक्सर बातें करते थे। कोई नई रचना की बात होती तो उनसे गहन विमर्श होता... वे उदार हृदय से परामर्श देते, हौसला अफ़जाई करते, लिखने के लिए प्रेरित करते।

मुझे याद है, उपन्यास ‘मैं जनक नंदिनी’ शुरु करने से पहले मेरी झिझक को सहज बनाते हुए उन्होंने कहा था“बेशक इस विषय पर आप लिख सकती हैं, आपका लेखन निरपेक्ष होता है।” उनके इन शब्दों ने मुझे बहुत बल दिया था। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मेरी अधिकांश पुस्तकों का शीर्षक उन्हीं का दिया हुआ है।

जब भी पटना जाना हुआ, रानीघाट जाना मेरी प्राथमिकता में रहा, क्योंकि उन्हीं की तरह उदार हृदय व विदुषी हैं उनकी सहधर्मिणी डॉ. स्नेहा जिनका प्रेम भी भरपूर मिलता। कभी वहाँ नहीं गई तो उनका उपालंभ सुनना पड़ा कि अब तो आपका अपना घर हो गया है यहाँ, अब रानीघाट क्यों याद आयेगा। 

कभी रचना की उत्पत्ति से पूर्व उनसे राय लेना और उनका उदारता से उस पर राय देना उनके विराट हृदय का साक्षी रहा। 

2003 में जब राजकमल प्रकाशन से मेरा उपन्यास ‘मैं और वह’ प्रकाशित हुआ था। सीतामढी में आयोजित पुस्तक मेले में उसके विमोचन के लिए आमंत्रण पर हृषीकेश सुलभ और संतोष दीक्षित के साथ उनका आना और उपन्यास पर दिल खोलकर बोलना। ऐसे मित्र का जाना...क्या शब्दों में बयान हो सकता है । 

यह कहना मुश्किल है कि वे अच्छे इंसान थे या अच्छे कथाकार...। बेशक वे इंसान और साहित्यकार दोनों रूप में बहुत अच्छे थे जिसका उदाहरण मिलना कठिन है। साहित्य की यात्रा के दौरान इंसान की ही तो परख करने का अवसर मिला है जिसमें अच्छाई का अव्वल नंबर अवधेश प्रीत के ही हिस्से में गया है।

हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ़्तर में अति व्यस्तता के बीच भी आगत मित्रों के लिए समय निकाल लेना, उनकी अवहेलना ना करना। चाय की चुस्की लेते हुए हर विषय पर सहजता से बातें करना उन्हें सबसे अलग करता था। मित्र ही नहीं परिचितों की भी नयी रचनाओं पर बातें करना। उनकी रचनाओं पर चंद शब्द ही सही, लिखना। यह उनकी सहजता तथा सहृदयता का परिचायक था।

उनकी एक चर्चित कहानी थी ‘अली मंजिल’ जिसका अनुवाद मैंने उर्दू में किया था और वह पाकिस्तान की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई और उस पर वहाँ से पाठकों की अच्छी प्रतिक्रियाएँ आयी थीं। तब वे बहुत खुश हुए थे।

परन्तु आज अचानक उनके चले जाने की खबर ने जैसे समय को थाम लिया। विश्वास ही नहीं हुआ कि जो कल तक सम्मुख थे  आज स्मृति बन गये। बहुत-सी बातें अनकही ही रह गयीं...। आपका होना अभी जरूरी था हमारे बीच...। अब तो पटना पुस्तक मेला का प्रागंण, मंच और मित्रगणों की उदास नज़रें उस नहीं आने वाले की प्रतीक्षा करेंगी...।

परंतु मृत्यु केवल शरीर का अंत है, सच्चे मित्र की यादें कभी नहीं मरतीं। बहुत याद आयेगा आपका आत्मीय व्यवहार...आपका प्रोत्साहन...आपका परामर्श...आपका जो सहयोग, स्नेह मिला है वह मेरी स्मृति में सदैव जीवित रहेगा।

 

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