एक था जाँस्कर : खोई हुई विरासत की खोज

घुमक्कड़ हिमालय यात्री अजय सोडानी के नवीनतम यात्रा-वृत्तांत ‘एक था जाँस्कर’ को पढ़ने के बाद सुपरिचित इतिहासकार और हिमालयी क्षेत्र के शोधकर्ता शेखर पाठक ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी है। आप भी पढ़िए।

प्रिय अजय ज्यू, 

लगभग तीन माह कर्नाटक, केरल, गोवा और राजस्थान की कुछ जगहों में रह-घूमकर नैनीताल लौटा तो मेरी मेज पर एक किताब बैठी थी—‘एक था जाँस्कर’, नज़र मिली और यात्रा की थकान जैसे पिघल के गुम हो गई। मैंने अगले तीन दिनों में यात्रा का आनन्द लिया और एक उदासी के साथ इसका पारायण कर लिया, उस समय मन में कितनी ही बातें थीं। फिर छह दिन देहरादून की तरफ़ जाना हुआ, कितनी बातें रह गई। सोचा बाकी ज़रूरी लिख लूँ।

मुझे किताब की पठनीयता, बाँधकर रखने की क्षमता, भाषा के अद्भुत प्रयोग, नये शब्दों को अनुभव और इतिहास की गुफाओं और साँचों से निकालना और प्रकृति तथा उसके दुर्गम इलाके की सन्ततियों की पक्षधरता ने भीतर तक भर दिया, लगा कि पहली बार इस तरह के अलग गद्य, यात्रा पथ को समझने की तन्मयता और प्रकृति की पक्षधरता से गुजर रहा हूँ। मिथकों में से वर्तमान संकट को समझने के लिए कोई टुकड़ा, कोई कहानी ढूँढ़ ले आना और उसे आज की विडम्बना को समझाने के लिए इस्तेमाल करना कम आकर्षक नहीं है। तथाकथित बड़ी संस्कृति या धर्म व्यवस्था की व्यापक और मारक घुसपैठ को कई जगह उजागर किया गया है।

जुलाई, 2013 के पहले दो सप्ताहों में यात्रा होती है। एक प्रकार से व्यास, चन्द्रभागा और जाँस्कर-सुरू नदियों और इनके बीच के दर्रों के साथ-साथ या उनके जलाशयों में, सारतः यह बौद्ध इलाका है पर यात्री उन तमाम मानव पतों को पकड़ने की फिराक़ में है, जो इस इलाके में बौद्ध परम्परा के विकसित होने से पहले आये होंगे। यात्री इसके साथ ही उस संस्कृतिकरण को भी स्पष्टता से पकड़कर पेश करता है, जिसमें स्थानीय देवताओं के ऊपर जबरन रघुनाथ या शिव की अध्यक्षता थोपी जाने लगी है। कहीं पुरातत्व तो कहीं रूपापत्य के साथ खेलकर दिया गया है।

रोहतांग के पार जाकर ही एक बची विरासत से मुलाकात होती है जिसका विस्तार तिब्बत, लेह तथा जाँस्कर तक होता है। भूगोल कैसे समुदायों और उनकी संस्कृतियों और अर्थ व्यवस्थाओं की रचना करता है, यह भी उजागर होता चला जाता है।

जिस तहस-नहस करने वाली सड़क को स्थानीय लोग भी छिपे या प्रदर्शि‌त उत्साह से स्वीकार करने को मन बना रहे हैं, यात्री उसके बिल्कुल खिलाफ़ खड़ा है। वह सत्ता प्रतिष्ठान की पोल खोलता है, जब वह कहता है कि आज की लोकशाही भड़ुवागिरी कर रही है।

जाँस्कर किसी के दाँये रह गया और किसी के बाँये, इस संग्रीला को इसकी भौगोलिक स्थिति ने आज तक कायम रखा, या तो दारचा से चढ़ाई चढ़ो, दर्रे पार करो या कारगिल से सुरू नदी के साथ चलो, नुनकुन से नज़रें मिलाते हुए और या जमी हुई जाँस्कर नदी के साथ चलो। सिन्धु नदी को टाटा करते हुए, पूरी तरह उत्तर वाहिनी है जाँस्कर नदी, मैं भी दोनों बार कार‌ग‌िल से सुरू नदी के साथ पदम तक गया था। जाँस्कर की रचना शायद जरा इत्मिनान से हुई, जब टैथिस समन्दर धीरे-धीरे गुम होता जा रहा था, यह वैसा ही खोया-खोया, स्वायत्त, खुदमुख़्तार इलाका रहा, जैसा पूर्वोत्तर में तवाँग क्षेत्र, जो लम्बे समय तक न तिब्बत में था और न असम में।

विलियम मूरक्राफ्ट की मुलाकात सोमा कोरोसी से 1822 के अन्त या 1823 के शुरुआती महीनों में कभी द्रास में हुई थी। उसी ने कोरोसी को कलकत्ता जाने और एशियाटिक सोसायटी के सदस्यों से मिलने को कहा, जो उसके तिब्बती भाषा और संस्कृति के अध्ययन या ल्हासा जाने में मददगार हो सकते हैं। मूरक्राफ्ट ने जाँस्कर के याँगला मठ के मुख्य लामा को पत्र लिखा कि कोरोसी को वहाँ मठ में रहने, अध्ययन करने और तिब्बती भाषा को सीखने में मदद दें। कोरोसी ने इसी प्रेरणा से जनवरी 1825 में सबाटू में कम्पनी के पॉलिटिकल एजेन्ट को अपनी दास्तान पेश की, जो रॉयल ऐशियाटिक सोसायटी के जर्नल में छपी और उसके कलकत्ता जाने का रास्ता खुला। कलकत्ता पहुँचने के बाद 1934 में तिब्बती-अँग्रेजी शब्दकोश छपा। कोरोसी जाँस्कर के याँगला और पुकदर मठ में और बुशहर के कानम मठ में भी रहे। 58 साल की उम्र में 1842 में कोरोसी ल्हासा यात्रा को निकले और दा‌र्जिलिंग पहुँचे जहाँ हिल डायरिया से उनकी मौत हो गई।

राहत, मंगलेश, नरेश सक्सेना, आसिम वास्ती, बशीर, केदारनाथ सिंह, कैफ़ी आज़मी आदि का कलाम ख़ूबसूरती से आपके गद्य के बीच नदी के द्वीप की तरह लगते हैं। लवलाक का गाया विचार भी ठीक जगह पर बखान हुआ। जलवायु बदल पर भी बहुत कुछ कह गए हैं। 

सबसे ख़ूबसूरत शब्द जो आपने इज़ाद किया है वह है—फिरन्दर। 

यात्राओं को अर्थवान बनाते, बड़े उद्देश्य और मुद्दों से जोड़ते रहें। आगामी यात्राओं के लिए आपको, अपर्णा जी को, टीनू, सोनी और पासंग को अग्रिम‌ शुभकामनाएँ।

 

आपका,

शेखर पाठक

 

[अजय सोडानी की पुस्तकें यहाँ से प्राप्त करें।]