सच्चिदानंद सिन्हा : रचनावली के सम्पादन का सौभाग्य

सच्चिदानंद सिन्हा रचनावली के सम्पादक अरविन्द मोहन का स्मृति-लेख

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मेरी नज़र में काफ़ी समय से देश में समाज विज्ञान के अध्येताओं और लेखकों में सच्चिदानंद सिन्हा के बराबर का कोई न था। उन जैसा ईमानदार और निष्ठावान राजनैतिक कार्यकर्ता भी गांधी युग के बाद इक्के-दुक्के ही दिखते हैं। कथनी-करनी के फ़ासले को न्यूनतम रखने की उन जैसी कोशिश भी कम ही दिखती है। खुद उनका लेखन तो समाजवादी आंदोलन के शीर्ष वाले दिनों से शुरू होकर ढलान वाले दौर में बढ़ता गया। किशोर वय में घर से भागकर समाजवादी आंदोलन के लिए कई तरह के काम करने के क्रम में उन्होंने ख़ूब पढ़ाई की थी जिसका प्रमाण उनके तब के लेखन में दिखने लगा था। इसी आधार पर डॉ. लोहिया ने उन्हें एक बार ‘मैनकाइन्ड’ के संपादक मण्डल में शामिल किया था। लेकिन साठ के दशक के आख़िर तक आने पर उन्होंने लेखन को मुख्य राजनैतिक कर्म बनाया। लेकिन तब समाज विज्ञान में हिन्दी का स्थान लगभग था ही नहीं। इसलिए उनको हिन्दी लिखने और प्रकाशन में परेशानी रही। 

अपने मित्र गिरिधर राठी की सलाह पर उन्होंने शहरी जीवन में गरीबों पर जो किताब लिखी (ज़िन्दगी सभ्यता के हाशिये पर) तो उसे प्रकाशित कराना भी मुश्किल हो गया। अंगरेजी में भी उनको अच्छे प्रकाशक मिले लेकिन उनका स्वभाव ऐसा था की वे किसी को इनकार न करते थे। इसी क्रम में उनकी अच्छी और ज्यादातर किताबें अनाम और कम चर्चित प्रकाशनों से आईं। उनके भतीजे सुरेन्द्र कुमार ने उनकी की किताबें छापीं जो एक तरह से उनके अधिकांश साहित्य को सामने लाने वाले भी बने लेकिन वह एक तरह की सीमा भी बनती गई।

सच्चिदा जी की पहली चर्चित हिन्दी कृति ‘संस्कृति विमर्श’ बनी जो वाग्देवी प्रकाशन से छपी थी। उनकी एक-दो किताबें (मानव सभ्यता और राष्ट्र राज्य) हम दोस्तों ने प्रकाशन के काम में हाथ आजमाने के लिए प्रकाशित कीं। मुझे जाति पर उनकी किताब सबसे अच्छी लगती थी पर इसका अंगरेजी प्रकाशक भी थोड़े समय में प्रकाशन व्यवसाय से ही गायब हो गया। बहुत प्रयास के बाद राजकमल से उनकी जाति व्यवस्था वाली किताब का अनुवाद आया तब जाकर सच्चिदा बाबू को हिन्दी जगत ने अपनाया।

इसके बाद दूसरे प्रकाशनों ने उनकी कई किताबें छापी और भी लोग सामने आए। तब तक धर्मयुग, दिनमान, रविवार, जनसत्ता, हिंदुस्तान, इतवारी पत्रिका और किशन पटनायक, सच्चिदा जी और अशोक सेकसरिया की त्रिमूर्ति सम्पादन वाली पत्रिका ‘सामयिक वार्ता’ ने उनके लेखन का यश काफ़ी फैला दिया था। सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों में निरंतर सक्रियता के चलते वे बहुत से व्याख्यानों, प्रशिक्षण शिविरों और सेमिनारों वगैरह में बोलने गए।

आम लेखक की तरह प्रकाशन, समीक्षा, रॉयल्टी वगैरह की चिंता से ऊपर हो गए सच्चिदा जी की किताबों का प्रकाशन भी बेतरतीब चला, लेख संग्रह तो जिसे सूझा उसे उन्होंने हाँ कह दिया। अच्छी तैयारी से लिखे परचे और सेमिनार पेपर भी बिखरे रहे। कई पुस्तिकाएँ एकाधिक लोगों ने छाप दी थी। कई बार उनकी लिखी कोई चीज़ याद आए तो उसे ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता था। यह सिर्फ़ मेरे साथ नहीं था। अपनी राजनैतिक चेतना और लिखाई-पढ़ाई के किशोर वय से ही सीधे उनके प्रभाव में रहने के चलते मैं इस बिखराव को लेकर ज्यादा चिंतित रहता था। मैं कई साल उनके साथ रहा। मुझे वे मानते भी बहुत थे। सो मैंने रचनावली की योजना उनके सामने रखी तो उनकी तरफ़ से ‘हाँ’ मिलने में देरी न हुई। 

मुझे अपनी संग्रह-कला की जगह अच्च्युतानन्द नवीन, अतुल, रामजय और समाजवादी जन परिषद के अन्य साथियों के सहयोग और संग्रह का भरोसा था। प्रयाग शुक्ल जी, राठी जी, हरिमोहन, योगेंद्र और प्रेम सिंह जैसे सीनियर और मित्रों के सहयोग की उम्मीद थी। इन सबने पूरा सहयोग दिया और भले किताब में सम्पादक के रूप में मेरा ही नाम गया लेकिन असल काम नवीन जी और अतुल जैसों का भी है। कोरोना काल ने घर में बैठने की मजबूरी पैदा करके इस काम को पूरा करने का अवसर भी बना दिया। जब  राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी ने रचनावली के प्रकाशन के लिए हाँ कर दी तो मुझे किसी और के पास जाने की ज़रूरत ही नहीं हुई।

रचनावली के प्रकाशन का बाक़ी सबने स्वागत किया लेकिन खुद सच्चिदा जी जितने खुश हुए वही इसका सबसे बड़ा पारिश्रमिक था। अपने लेखन को वे इस रूप में देखने की उम्मीद नहीं रखते थे और वह भी हिन्दी में। मुझसे मिलने पर उनकी टिप्पणी यही थी कि इतना सारा लिख दिया मैंने। अन्य करीबी लोगों को लगता है कि रचनावली के प्रकाशन से उनकी उम्र थोड़े बढ़ गई। मोतियाबिंद के जिस आपरेशन के लिए वे कभी अस्पताल से भाग आये थे वह हुआ, पर देर के चलते एक ही आँख ठीक हो पायी।  इससे भी वे फिर से पढ़ने-देखने लगे थे लेकिन मोह से ऊपर होते गए। जब साथ था तब वे हर साल दिवाली की सफ़ाई के समय वे अपनी किताबों, पत्रों समेत काफ़ी चीज़ें निकालकर किसी न किसी को दे देते थे। एक बार मैंने जर्मन लेखक शूमाखर के पत्र देखे तो उन्हें उठा लाया। उनके बक्से में दो तीन जोड़ी कपड़ों के साथ उनकी अपनी किताबें और पाँच सात नामी किताबें रहती थी। रचनावली का विमोचन उनके गाँव में ही हुआ और वे बहुत खुश थे पर जल्दी ही उन्होंने आठ जिल्दों का यह सेट भी एक रिसर्चर को पकड़ा दिया।

अब सच्चिदा जी नहीं हैं। केवल मेरे पास ही नहीं बल्कि बहुत से ठिकानों पर मौजूद यह रचनावली उनकी दमदार उपस्थिति बनाए हुए है। ऐसा पुस्तकालयों के मामले में और भी उल्लेखनीय है क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में पाठक-रिसर्चर उसका लाभ ले सकते हैं। मुझे तो उनके साथ नाम जोड़कर जो यश मिला है और मिल रहा है उसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। मैंने तो एक शिष्य या पुत्रवत जूनियर की चिंता से चीज़ों को समेटने और संभालने भर का काम किया है। उनकी स्मृति को नमन और उनके लेखन को सलाम।

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