लेखक-पत्रकार पुष्यमित्र महात्मा गांधी को पहली बार चम्पारण ले जाने वाले किसान नेता राजकुमार शुक्ल की 150वीं जयन्ती पर उन्हें याद कर रहे हैं, आप भी पढ़ें।
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आज राजकुमार शुक्ल की 150वीं जयन्ती है मगर इक्का-दुक्का आयोजनों के अलावा उन्हें कोई याद नहीं कर रहा। न सरकार, न चुनावी जंग में उलझे राजनीतिक दल, न सामाजिक संगठन।
राजकुमार शुक्ल से ऐसा परहेज क्यों है, यह समझ से परे हैं। क्या सिर्फ़ इसलिए कि वे आज की वोटबैंक पॉलिटिक्स के खाँचे में फिट नहीं बैठते? और यह उपेक्षा भाव आज का नहीं है।
चंपारण सत्याग्रह पर किताब की सामग्री जुटाते हुए जिस व्यक्ति से मैं सबसे अधिक प्रभावित हुआ, वे शुकुल जी ही थे। उनके नाती रवि भूषण राय से मैं साल 2017 के अप्रैल महीने में पहले पहल मिला था। तब बिहार सरकार चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह की तैयारी कर रही थी। अवकाश प्राप्त दारोगा रवि भूषण राय हमारे दफ़्तर आये थे, उनकी शिकायत थी कि सरकार इस भव्य आयोजन में उस राजकुमार शुक्ल के परिजन को याद नहीं कर रही, जिन्हें पहली बार गांधी को बिहार लाने का श्रेय जाता है। बाद में उनसे कई बार बातें हुईं, उन्होंने बड़े दुख के साथ कहा कि स्थिति यह है कि इस अभूतपूर्व मौके पर भी आप चाहें तो राजकुमार शुक्ल के गांव तक नहीं पहुंच सकते, सड़कों का इतना बुरा हाल है।
गुजरात से एक डेलीगेशन उस साल आया था। भितिहरवा आश्रम घूमने के बाद उसने शुकुल जी के गांव सतवरिया जाने की कोशिश की, मगर सड़कें इतनी खस्ताहाल थी कि उन्हें बीच रास्ते से लौटना पड़ा।
बाद में मैं भी उस गांव गया। रवि भूषण जी के भतीजे के साथ बाइक पर बैठकर गिरता-पड़ता सतवरिया पहुँचा। वहाँ मेरी मुलाकात रवि भूषण जी के बड़े भाई मणिभूषण जी से हुई जो अब काफ़ी वृद्ध हो चुके हैं। उन्होंने मुझे राजकुमार शुक्ल की वह डायरी दिखाई जिसमें साल 1917 के विवरण दर्ज हैं। कैथी लिपि में लिखी इस डायरी का महत्व इसलिए है, क्योंकि इसमें चंपारण सत्याग्रह के दौरान हुई घटनाओं का ब्योरा है।

राजकुमार शुक्ल की वह डायरी जिसमें साल 1917 के विवरण दर्ज हैं।
यह दुखद है कि चंपारण सत्याग्रह की ब्रांडिग राष्ट्रीय स्तर पर करने वाली बिहार सरकार राजकुमार शुक्ल का महत्व नहीं समझती। संभवतः सरकार के लोग शुकुलजी को एक सामान्य किसान नेता मानते रहे हैं, क्योंकि गांधी ने भी अपनी आत्मकथा में और चिट्ठियों में उन्हें अनपढ़ किसान कहा था। मगर जब हम चंपाऱण सत्याग्रह की घटनाओं का बारीकी से अध्ययन करते हैं तो शुकुलजी के किरदार का महत्व समझ आता है।
आप एक ऐसे इंसान के बारे में सोचिये जो 1915 से ही गांधी जी को चंपारण लाने की कोशिश में जुटा है। यह वही साल है जब गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये थे। शुकुलजी अहमदाबाद के आश्रम में जाते हैं तो पता चलता है गांधी पुणे चले गये हैं। शुकुलजी लौटकर कानपुर आते हैं और ‘प्रताप’ अख़बार के संस्थापक-संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलते हैं। फिर शुकुल जी बिहार प्रांतीय कांग्रेस के अधिवेशन में अपने साथियों के साथ पहुँचते हैं, वहाँ चंपारण का मसला उठाते हैं। वहाँ एक प्रतिनिधिमंडल का गठन होता है, जिसे 1916 में लखनऊ में आयोजित कांग्रेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाना है। उस प्रतिनिधिमंडल में चंपारण के अपने साथियों के साथ शुकुलजी भी होते हैं।
लखनऊ में शुकुलजी कांग्रेस की सभा के सामने चंपारण के किसानों का दुख-दर्द बखान करते हैं और तिलक, मालवीय और गांधी के पीछे पड़ जाते हैं कि आपको चंपारण चलना ही होगा। शुकुलजी कुछ इस तरह पीछे पड़ जाते हैं कि गांधी को हाँ कहना पड़ता है, मगर इतने से शुकुलजी नहीं मानते। वे गांधी के पीछे-पीछे कानपुर पहुँच जाते हैं, कहते हैं तारीख़ दीजिये।
चंपारण आकर वे गांधी से पत्राचार करते हैं कि कब आइयेगा। और गांधी के कोलकाता पहुँचने पर ख़ुद भी वहाँ पहुँच जाते हैं और गांधी को खींचकर जबरन चंपारण ले आते हैं, उस चंपारण में जहाँ से भारत में गांधी का राजनीतिक जीवन शुरू होता है। सत्याग्रह की शुरुआत होती है, गांधी एक वस्त्र पहनने का संकल्प लेते हैं, सामाजिक कार्यों की शुरुआत करते हैं और अपने आन्दोलनों की रूपरेखा तैयार करते हैं।
शुकुलजी का महत्व सिर्फ़ इतना ही नहीं है कि वे गांधी का महत्व तब से समझते थे, जब देश में गांधी आये ही थे। बल्कि वे यह भी समझते थे कि चंपारण के किसानों की लड़ाई को स्थानीय आन्दोलन के जरिये नहीं जीता जा सकता। इसके लिए चंपारण को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना होगा। वे कोलकाता से लेकर कानपुर तक की नियमित यात्रा करते थे और ‘आनंद बाजार पत्रिका’ से लेकर ‘प्रताप’ तक जैसे अख़बारों के संपादकों से संपर्क में रहते थे। उन्हें और उनके संवाददाताओं को चंपारण से जुड़ी खबरों के इनपुट देते थे। वे ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे वकील के संपर्क में थे, जो बिहार स्टेट लेजिस्लेटिव काउंसिल के मेंबर थे। ब्रजकिशोर प्रसाद ने उनके ही इनपुट से काउंसिल में चंपारण का सवाल उठाया था।
शुकुलजी लगातार घूमते थे। चंपारण के गांवों से लेकर बेतिया, मोतिहारी और मुजफ्फ़रपुर तक रैयतों के मुकदमे की पैरवी के लिए और पटना, लखनऊ, कोलकाता, कानपुर और अहमदाबाद तक चंपारण के सवाल को आगे बढ़ाने के लिए। गांधी जी ने उन्हें अनपढ़ किसान लिखा है, मगर वे कई अख़बारों के नियमित ग्राहक थे। और उनकी समझ कितनी साफ़ थी, यह चंपारण के सवाल को लेकर गठित जाँच आयोग के सामने पेश किये गये उनके बयान को पढ़कर समझा जा सकता है।

राजकुमार शुक्ल
यह चंपारण सत्याग्रह की सफलता ही थी कि बिहार में राजेंद्र बाबू, मजहरूल हक, ब्रजकिशोर बाबू जैसे लोगों की राष्ट्रीय पहचान बन गयी। मगर इस आन्दोलन के जमीनी सिपाही राजकुमार शुक्ल, पीर मोहम्मद मूनिस, शेख गुलाब, हरबंस सहाय आदि लोग चंपारण तक ही सीमित रह गये। गांधी के जाने के बाद इन्होंने घनघोर यातनाएँ सहीं, अंग्रेजों ने इन्हें ख़ूब परेशान किया। कहते हैं, एक बार ने गांधी से मिलने अहमदाबाद गये थे तो कस्तूरबा इनकी सेहत देखकर रोने लगीं। आखिरकार 1929 में शुकुलजी का निधन हो गया।
उनके निधन के बाद किसी सरकार ने उनकी सुध नहीं ली। मदद की भी तो उस नीलहे प्लांटर एसी एम्मन ने जिसके खिलाफ़ वे ताउम्र लड़ते रहे। उन्होंने शुकुलजी के दामाद को पुलिस सेवा में नौकरी लगवा दी। बेटी ही शुकुलजी की वारिस थी। आज़ादी के बाद भी सरकारों ने उन पर ध्यान नहीं दिया।
बिहार सरकार के चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि सरकार ने गांधी को तो खूब याद किया, मगर इन स्थानीय नायकों को स्थापित करने के लिए कुछ भी नहीं किया। इनके लिए सिर्फ़ रस्मअदायगी होती रही। यही वजह है कि आज भी आप राजकुमार शुक्ल के गांव नहीं पहुंच सकते, शेख गुलाब के गांव साठी चले भी जायें तो उनका घर नहीं ढूँढ सकते। सरकार शायद इस बात को नहीं मानती कि जो समाज अपने नायकों को इस तरह उपेक्षित रखता है वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता।
