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Posted: March 22, 2024
रंग याद है : मार दिया छुरा, निकल गया दम
‘रंग याद है’ शृंखला की इस कड़ी में राजकमल ब्लॉग पर पढ़ें, गीताश्री के बचपन की रंगयाद : “मार दिया छुरा, निकल गया दम”Read more -
Posted: March 21, 2024
रंग याद है : कोड़ों के प्रहार और पानी के छपाके
Read more‘रंग याद है’ शृंखला की तीसरी कड़ी में राजकमल ब्लॉग पर पढ़ें, भगवानदास मोरवाल के बचपन की रंगयाद : “कोड़ों के प्रहार और पानी के छपाके”
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Posted: March 20, 2024
रंग याद है : रंग में भंग फिर रंग
Read more‘रंग याद है’ शृंखला की पहली कड़ी में राजकमल ब्लॉग पर पढ़ें, ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास से ख्यात कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के बचपन की रंगयाद : “रंग में भंग और फिर रंग”
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Posted: March 20, 2024
रंग याद है : होलियाँ जो खेलीं, न खेलीं
Read more‘रंग याद है’ शृंखला की दूसरी कड़ी में राजकमल ब्लॉग पर पढ़ें, मृणाल पाण्डे के बचपन की #रंगयाद : “होलियाँ जो खेलीं, न खेलीं”
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राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, उनके उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ का एक अंश। व्यंग्य-प्रधान शैली में लिखा गया यह उपन्यास आज के हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों को पूरी सच्चाई के साथ पेश करते हुए हमारे आज के बुद्धिजीवियों के सामने एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।