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आमतौर पर हमारा समाज-मन एक प्रश्नहीन आनुगत्य चाहता है, और इसलिये कोई भी जिज्ञासा, कोई भी समालोचना, कोई भी भिन्नमत फौरन प्रबल विरूपता, या लगभग आक्रोश ही उत्पन्न कर देता है और ऐसे में विभिन्न विचारों और समन्वय में से होते हुए सामने की ओर अग्रसर होने वाला पथ अवरुद्ध होता जाता है।
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मान लीजिए, रवीन्द्रनाथ की कविताएँ आपको अच्छी लगती हैं, लेकिन मुझे नहीं लगतीं। आपको लगता है कि नि:संग किसी फुर्सत के समय को भी जिस तरह वे कविताएँ आनन्द से भर सकती हैं, ठीक उसी तरह जीवन के अत्यन्त प्रखर संकटपूर्ण क्षणों में भी उनसे वैसा ही आश्वासन मिल सकता है, वे कविताएँ आपके समूचे जीवन की साथी बन सकती हैं, यहाँ तक कि मृत्यु के क्षण में भी आश्रय बन सकती हैं। ‘कविकाहिनी’ से ‘अन्तिम रचना’ तक एक कवि के उन्मोचन और विकास की छवि देखते-देखते सम्भवत: आप स्तब्ध हो जाते हैं, हो सकता है उनकी विभिन्न स्तर की कविताओं को पढ़ते-पढ़ते आपको बुद्धदेव बसु के ‘कविता की सात सीढ़ियाँ’ शीर्षक वाले लेख की याद हो आती हो, जहाँ बुद्धदेव ने बताना चाहा था कि
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प्रेमचन्द ने अपने लेख 'राष्ट्रवाद और अन्तरराष्ट्रवाद' में लिखा था : 'राष्ट्रवाद आधुनिक कैंसर है, उसी तरह जैसे साम्प्रदायिकता मध्ययुग का कैंसर थी।'
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हजारी प्रसाद द्विवेदी की पुण्यतिथि पर राजकमल ब्लॉग में पढ़ें, 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के श्रेष्ठ निबन्ध' पुस्तक से उनका निबन्ध 'भीष्म को क्षमा नहीं किया गया!'
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ब्लॉग के इस अंक में पढ़ें, रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' का अंश 'नागरिक पत्रकारिता की ताकत'। यह रवीश कुमार द्वारा मनीला में 6 सितंबर, 2019 को रैमॉन मैगसेसे सेंटर में दिए गए भाषण का संपादित अंश है जिसे इस किताब में संकलित किया गया।
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राजकमल प्रकाशन समूह के ब्लॉग के इस अंक में पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी और उनकी शायरी के बारे में चर्चा की गई हैं।