भक्ति और काव्य की जिस युगान्तकारी नयी चेतना के साथ कबीर समाज और साहित्य में आए। उन्होंने भावबोध और सौन्दर्य बोध के स्तर पर व्यापक हलचल पैदा की। इस हलचल का ही परिणाम था कि समाज और साहित्य में जीने और आस्वाद के नये प्रतिमान बने, व्यापक जनसमुदाय को धर्म-कर्म की पोथियों के आतंक-राज से मुक्ति मिली। तय था कि कबीर आदि सन्तों की अभिव्यक्ति में न तो वह भाव था और न वह शैली जो शास्त्र-सम्मत हो। धर्मशास्त्र और काव्यशास्त्र की तमाम रूढ़ियों को चुनौती देने वाले इन सन्तों को भले ही शास्त्रीय आचार्यों ने भला बुरा कहा हो, वे समाज-साहित्य में रूढ़ि-भंजक चेतना के संवाहक बने और उनके पीछे उत्पीड़ितों-उपेक्षितों की विशाल वाहिनी खड़ी हुई।
ऐसे संतों के लिखे हुए साहित्य को समाज में महत्व मिलना आसान नहीं था। एक तो शासन विरोधी विद्रोही भावधारा, दूसरे पारम्परित साहित्य-संस्कार से हीन जनों की नयी और मौलिक उक्तियाँ। इन्हें समझने के लिए शास्त्र से अधिक लोक-पीड़ा का ज्ञान आवश्यक था; साथ ही काव्यालोचन के नये और मौलिक आधारों की खोज करने वाली उस नवोन्मेषी दृष्टि की जरूरत थी, जो एक समानान्तर काव्यशास्त्र की रचना कर सके। साहित्य की अदालत में कबीर आदि संत कवियों को लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ी। कविता के महान आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ‘अपढ़-गँवार’, ‘दर्पोक्तियाँ हाँकने वाले’, ‘शास्त्र-ज्ञान से हीन’, ‘काव्यानुभूति से रहित’ आदि विशेषणों से विभूषित करके अन्ततः खारिज कर दिया। इन्हें वास्तविक प्रतिष्ठा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के हाथों मिली जो नयी आलोचना दृष्टि के साथ साहित्य में आए। द्विवेदी जी के लिए भक्ति आन्दोलन महान जन-आन्दोलन था और उसकी भावधारा से निकले सन्तों का एक ही धर्म था ‘लोक’। ‘लोक’ शुक्ल जी के मूल्यांकन का भी मुख्य आधार था। लेकिन वह ‘लोक’ कुछ भिन्न था।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Prabhakaran Hebbar Illath |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 274p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22.5 X 14 X 2 |