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Sabaar Upare Manush Satya

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Sabaar Upare Manush Satya

भक्ति और काव्य की जिस युगान्तकारी नयी चेतना के साथ कबीर समाज और साहित्य में आए। उन्होंने भावबोध और सौन्दर्य बोध के स्तर पर व्यापक हलचल पैदा की। इस हलचल का ही परिणाम था कि समाज और साहित्य में जीने और आस्वाद के नये प्रतिमान बने, व्यापक जनसमुदाय को धर्म-कर्म की पोथियों के आतंक-राज से मुक्ति मिली। तय था कि कबीर आदि सन्तों की अभिव्यक्ति में न तो वह भाव था और न वह शैली जो शास्त्र-सम्मत हो। धर्मशास्त्र और काव्यशास्त्र की तमाम रूढ़ियों को चुनौती देने वाले इन सन्तों को भले ही शास्त्रीय आचार्यों ने भला बुरा कहा हो, वे समाज-साहित्य में रूढ़ि-भंजक चेतना के संवाहक बने और उनके पीछे उत्पीड़ितों-उपेक्षितों की विशाल वाहिनी खड़ी हुई।

ऐसे संतों के लिखे हुए साहित्य को समाज में महत्व मिलना आसान नहीं था। एक तो शासन विरोधी विद्रोही भावधारा, दूसरे पारम्परित साहित्य-संस्कार से हीन जनों की नयी और मौलिक उक्तियाँ। इन्हें समझने के लिए शास्त्र से अधिक लोक-पीड़ा का ज्ञान आवश्यक था; साथ ही काव्यालोचन के नये और मौलिक आधारों की खोज करने वाली उस नवोन्मेषी दृष्टि की जरूरत थी, जो एक समानान्तर काव्यशास्त्र की रचना कर सके। साहित्य की अदालत में कबीर आदि संत कवियों को लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ी। कविता के महान आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ‘अपढ़-गँवार’, ‘दर्पोक्तियाँ हाँकने वाले’, ‘शास्त्र-ज्ञान से हीन’, ‘काव्यानुभूति से रहित’ आदि विशेषणों से विभूषित करके अन्ततः खारिज कर दिया। इन्हें वास्तविक प्रतिष्ठा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के हाथों मिली जो नयी आलोचना दृष्टि के साथ साहित्य में आए। द्विवेदी जी के लिए भक्ति आन्दोलन महान जन-आन्दोलन था और उसकी भावधारा से निकले सन्तों का एक ही धर्म था ‘लोक’। ‘लोक’ शुक्ल जी के मूल्यांकन का भी मुख्य आधार था। लेकिन वह ‘लोक’ कुछ भिन्न था। 

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Prabhakaran Hebbar Illath
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 274p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14 X 2
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Prabhakaran Hebbar Illath

Author: Prabhakaran Hebbar Illath

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत पाणप्पुषा, कण्णूर, (केरल)के निवासी हैं। फ़िलहाल वे कालिकट विश्वविद्यालय, मलघुरम, केरल के हिन्दी विभाग में आचार्य हैं। आपकी अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं—निराला के काव्य-निर्माण में वैदिक संस्कृति की भूमिका, राजभाषा हिन्दी : कुछ विचार, संस्कृति भाषा साहित्य, यह पृथ्वी हमारी भी है, पर्यावरण और समकालीन हिन्दी साहित्य, मानवाधिकार और समकालीन हिन्दी कविता, राजा रवि वर्मा : द कोलोसस ऑफ इंडियन पेंटिंग, (मौलिक); स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में मानवाधिकार, मानवाधिकार की राजनीति, प्रकृति और अन्तर्प्रकृति, हिन्दी का पर्यावरणीय साहित्य, हरित कविता, नेचुरल रिवरबरेशंस (सम्पादित); गंगा, नारायण गुरु की यात्रा, सिद्धार्थ (अनूदित) आदि। इनके अलावा हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक शोध-आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपने अब तक पाँच शोध परियोजनाएँ पूरी की हैं। उन्हें केरल हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, यूजीसी शोध पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर हिन्दी लेखक पुरस्कार, बालकृष्ण गोयनका अनुवाद पुरस्कार, डॉ. एल. सुनीताबाई ज्ञान पुरस्कार, हिन्दी साहित्य शिरोमणि सम्मान, भारतीय उच्च शैक्षणिक संस्थान, शिमला की एसोसिएट फेलोशिप आदि से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected]

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