Facebook Pixel

Manush Janam Anoop

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
25% Off
Out of stock
SKU
Manush Janam Anoop

मानवीयता अपने आप में मानव के अंतस का उजालापन है, संकीर्णता का विरोधी है, प्रेम के देदीप्यमान रूप का अभिधान है। यही मनुजता जीवन के सौंदर्यात्मक स्वरूप को विकीर्ण करती है। जीवन की सुंदरता जब अमानवीयता के प्रसार से कलंकित हो जाती है तो कबीर प्रेम का मशाल जलाते हैं। मध्यकालीन कवियों की विशेषता यही रही है कि उन्होंने मानवता को अपने धर्म के रूप में स्वीकार किया, जिसके सहारे मानव-मानव के बीच मैत्री की ज्योति जलाई। इसी मानवता के बल पर मध्यकालीन भक्त कवि समाज के सदस्यों की जीवंत समस्याओं को संबोधित करते रहे। इसलिए मुक्तिबोध भक्ति-काव्य पर विचार करते हुए कहते हैं कि “समूचे भक्ति आंदोलन के मूल में जनता का दुख-दर्द ही है और उन दुख-दर्दों को बड़ी जीवंत मानवीयता के साथ उभारने, उनसे एकमेक होकर सामने आने में ही भक्ति आंदोलन की शक्ति को देखा जा सकता है।” कबीर सरीखे कवियों ने कथनी और करनी की अभेदता दिखाई-सिखाई और जीवन में परहित धर्म के महत्व को इस अंदाज़ में दर्शाया कि भेद की दीवारें ढहती गईं। जो दुर्दम पाखंड अपने समय में दिखे, उनके मुखौटों को वे निर्मम होकर चीर-फाड़ करते रहे। अंधेरे में कबीर रोशनी बने। उसके बल पर जनता के मानस में अथक आत्म-विश्वास एवं स्थैर्य जाग्रत किए। “ऐसे थे कबीर! सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कड़, आदत से अक्कड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ़, दिमाग से दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे, अनुभव के आधार पर कहते थे। इसलिए उनकी उक्तियां बेधनेवाली और व्यंग्य चोट करने वाली होती थीं।” संत मलूकदास इसलिए कबीर के बारे में कहते हैं कि “हमारा सद्गुरु विरले जाने।” 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Prabhakaran Hebbar Illath
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 378p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 2.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Manush Janam Anoop
Your Rating
Prabhakaran Hebbar Illath

Author: Prabhakaran Hebbar Illath

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत पाणप्पुषा, कण्णूर, (केरल)के निवासी हैं। फ़िलहाल वे कालिकट विश्वविद्यालय, मलघुरम, केरल के हिन्दी विभाग में आचार्य हैं। आपकी अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं—निराला के काव्य-निर्माण में वैदिक संस्कृति की भूमिका, राजभाषा हिन्दी : कुछ विचार, संस्कृति भाषा साहित्य, यह पृथ्वी हमारी भी है, पर्यावरण और समकालीन हिन्दी साहित्य, मानवाधिकार और समकालीन हिन्दी कविता, राजा रवि वर्मा : द कोलोसस ऑफ इंडियन पेंटिंग, (मौलिक); स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में मानवाधिकार, मानवाधिकार की राजनीति, प्रकृति और अन्तर्प्रकृति, हिन्दी का पर्यावरणीय साहित्य, हरित कविता, नेचुरल रिवरबरेशंस (सम्पादित); गंगा, नारायण गुरु की यात्रा, सिद्धार्थ (अनूदित) आदि। इनके अलावा हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक शोध-आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपने अब तक पाँच शोध परियोजनाएँ पूरी की हैं। उन्हें केरल हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, यूजीसी शोध पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर हिन्दी लेखक पुरस्कार, बालकृष्ण गोयनका अनुवाद पुरस्कार, डॉ. एल. सुनीताबाई ज्ञान पुरस्कार, हिन्दी साहित्य शिरोमणि सम्मान, भारतीय उच्च शैक्षणिक संस्थान, शिमला की एसोसिएट फेलोशिप आदि से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected]

Read More
New Releases
Back to Top