साहित्यकार जीवन के शब्दार्थ के भीतर क्रांतिमय विचार को प्रसार करने वाला होता है। साहित्य का लक्ष्य मानव के मन में परिवर्तन कर उसकी क्रियाओं को सकारात्मक रूप में परिवर्तित करते हुए जीवन को स्वस्थ दिशा प्रदान करना होता है। यह तभी संभव होता है, जब साहित्यकार संघर्षात्मक जीवन जीते हुए अपने अनुभवों को वाणीबद्ध करने का साहस करता है। शब्द निर्माता कवि विचार का निर्माता है। जिस भाषा में कवि या कलाकार नहीं जीता वैसी भाषा में नूतन विचारों को वहन करने की शक्ति नहीं रहती है। कवि के शब्द-अर्थ सामान्य लगने पर भी असामान्य होते हैं और उनमें नूतन कर्म की असामान्यता भी जुड़ी रहती है। भौतिक जीवन परिसर में संवेदनशील व्यक्ति के भीतर एक विशिष्ट भौतिक-वैचारिक ऊर्जा के रूप में ये शब्द-अर्थ अपनी भूमिका निभाने लगते हैं तो मानव की सामाजिक क्रियाएं नूतन आयाम ग्रहण करती हैं। यह वह वक्त है, जहाँ शब्द कर्म-शक्ति का रूप धारण करता है। साहित्यकार की भाषा कोरी काल्पनिक नहीं हो सकती है, वह जीवंत यथार्थ पर सुदृढ़ रहती है। यथार्थ के अधिग्रहण से मानव का लोकबोध विकसित होता है। इस आत्म-विकास को, स्वतंत्रता के क्षितिज का विस्तार, सत्य का अनुसंधान, सामाजिक विकास प्रक्रिया, मानवीयता का प्रसार, लोकतंत्रात्मकता का उन्नयन आदि के रूप में व्याख्यापित किया जा सकता है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 226p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22.5 X 14.5 X 2 |