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Bahubhaashikata Aur Bahusaanskritikata

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Bahubhaashikata Aur Bahusaanskritikata

भाषा एक सर्जनशील शक्ति है। भाषा एक ऐसा तत्त्व है जिसके ज़रिये मानव अपनी उन्नत सांस्कृतिक जीवन-यात्रा को सम्भव बनाता है। यह यात्रा मातृभाषा के माध्यम से सुरुचिपूर्ण ढंग से सम्भव होती है। वह चिन्तन-मनन, भाव-संवर्धन और कल्पनात्मक अभिव्यक्ति के साधन, सर्जनात्मक ऊर्जा और इच्छा-शक्ति के रूप में मानव-जीवन में सक्रिय रहती है। यही सक्रियता मानव-जीवन का सौन्दर्यात्मक विधान है। सूक्ष्म रूप में मानव का भाषिक कार्य मानव की चेतना और बाह्य प्रकृति के साथ किए जाने वाले संवाद का सुष्ठु रूप है। उसमें उसके सामाजिक जीवन के विभिन्न नज़ारे व मानवीय सम्बन्धों के विपुल संजाल प्रतिबिम्बित होते हैं।

भाषा से जुड़कर मनुष्य अपने अनुभव के बल पर इतिहास का निर्माण करता है और संस्कृति को समृद्ध करता है। संस्कृति उन्नत विचारों से परिचालित ज़िन्दगी या उत्कृष्ट मानवीय व्यवहारों का समुच्चय है। वह जीवन की उदात्तता को प्रमाणित करने वाला शब्द है और वह सर्जनात्मक संसाधन है, जिसका संवहन-संक्रमण-हस्तान्तरण भाषा करती है। इस नज़रिए से संस्कृति का विन्यास मानव की सौन्दर्यात्मक भाषा का विन्यास है जिसको मानव के सत्त्व के विकास के रूप में देखा जा सकता है। भाषा और संस्कृति की इस पारस्परिकता को, यह पुस्तक बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विचारोत्तेजक ढंग से प्रस्तुत करती है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Prabhakaran Hebbar Illath
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 186p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Prabhakaran Hebbar Illath

Author: Prabhakaran Hebbar Illath

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत पाणप्पुषा, कण्णूर, (केरल)के निवासी हैं। फ़िलहाल वे कालिकट विश्वविद्यालय, मलघुरम, केरल के हिन्दी विभाग में आचार्य हैं। आपकी अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं—निराला के काव्य-निर्माण में वैदिक संस्कृति की भूमिका, राजभाषा हिन्दी : कुछ विचार, संस्कृति भाषा साहित्य, यह पृथ्वी हमारी भी है, पर्यावरण और समकालीन हिन्दी साहित्य, मानवाधिकार और समकालीन हिन्दी कविता, राजा रवि वर्मा : द कोलोसस ऑफ इंडियन पेंटिंग, (मौलिक); स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में मानवाधिकार, मानवाधिकार की राजनीति, प्रकृति और अन्तर्प्रकृति, हिन्दी का पर्यावरणीय साहित्य, हरित कविता, नेचुरल रिवरबरेशंस (सम्पादित); गंगा, नारायण गुरु की यात्रा, सिद्धार्थ (अनूदित) आदि। इनके अलावा हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक शोध-आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपने अब तक पाँच शोध परियोजनाएँ पूरी की हैं। उन्हें केरल हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, यूजीसी शोध पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर हिन्दी लेखक पुरस्कार, बालकृष्ण गोयनका अनुवाद पुरस्कार, डॉ. एल. सुनीताबाई ज्ञान पुरस्कार, हिन्दी साहित्य शिरोमणि सम्मान, भारतीय उच्च शैक्षणिक संस्थान, शिमला की एसोसिएट फेलोशिप आदि से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected]

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