आज फिर करते हो किस ज़ोम प’ ज़ख़्मों का शुमार
सरफिरो! वादी-ए-पुरख़ार में ये तो होगा
क्यूँ निगाहों में है अफ़सुर्दा चराग़ों का धुवाँ
आरज़ू-ए-लबो-रुख़्सार में ये तो होगा
एक से एक कड़ी मंज़िले-जाँ आएगी
रहगुज़ारे-तलबे-यार में ये तो होगा
होंठ सिल जाएँ मगर जुरअते-इज़्हार रहे
दिल की आवाज़ को मद्धम न करो दीवानो!
ढल चुकी रात तो अब कुहर भी छट जाएगी
अब भी उम्मीद की लौ कम न करो दीवानो!
आँधियाँ आया ही करती हैं हरिक हब्स के बाद
गुलशुदा शम्ओं का मातम न करो दीवानो!
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 136p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1 |