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Kavita  Ki  Pakshadharta

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Kavita  Ki  Pakshadharta

कोई भी रचना अपने रचयिता की व्यक्तिगत अनुभूतियों और आकलनों से ही आकार ग्रहण करती है। लेकिन कोई भी अनुभूति या आकलन इतना व्यक्तिगत नहीं होता कि शेष समाज से उसका कोई सम्बन्ध न हो। वास्तव में रचना के सन्दर्भ में, यह बात विशेष रूप से विचारणीय है कि जिसको रचनाकार की व्यक्तिगत अनुभूति माना जाता है उसका उत्स भी उसके समाज और परिवेश में ही होता है, भले ही वह बिलकुल स्पष्ट हो या सांकेतिक। किसी रचना की पक्षधरता को इसी दृष्टि से समझा जा सकता है। इस सन्दर्भ में, उन कारकों की पहचान करना आवश्यक है जो रचना के स्वरूप और कथ्य को निर्धारित करते हैं। यहाँ कवि अनुज लुगुन की इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जो वह परम्परा और इतिहास के प्रति जीवन और दृष्टि की भिन्नता को लेकर कहते हैं—“जब दो भिन्न परम्पराएँ और इतिहास टकराते हैं तो हमेशा विजेता वर्ग की परम्परा और उसका इतिहास ही स्थापित होते हैं। विजयी होने की प्रक्रिया भाषा और संस्कृति के द्वारा स्थायी होती है। इसी प्रक्रिया में विजेता वर्ग मिथकों का निर्माण करता है। वह मिथकों के द्वारा विजितों का विरूपीकरण करता है और अन्ततः एक सांस्कृतिक उपनिवेश क़ायम हो जाता है।” अनुज की इस बात को आदिवासियों के सन्दर्भ में देखें तो यह सहज ही समझ में आता है कि ‘सभ्य’ समझे जाने वाला गैर-आदिवासी समाज जब आदिवासियों के बारे में लिखता है तो अपनी सभ्यतागत ‘श्रेष्ठता’ के कारण वह आदिवासियों के 'असभ्य' होने का मिथक गढ़ता है। जबकि आदिवासी रचनाकार को यह लिखते कोई संकोच महसूस नहीं होता कि ‘मैं भेड़िया कुल का हूँ’ क्योंकि वह स्वयं को अपने अरण्य-परिवेश से अभिन्न मानता है।

प्रस्तुत पुस्तक कविता के बहाने साहित्य में पक्षधरता के प्रासंगिक विषय को ऐसे अनेक हवालों से रोचक ढंग से विवेचित करती है।  

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Prabhakaran Hebbar Illath
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 282p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 2
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Prabhakaran Hebbar Illath

Author: Prabhakaran Hebbar Illath

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत

प्रो. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत पाणप्पुषा, कण्णूर, (केरल)के निवासी हैं। फ़िलहाल वे कालिकट विश्वविद्यालय, मलघुरम, केरल के हिन्दी विभाग में आचार्य हैं। आपकी अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं—निराला के काव्य-निर्माण में वैदिक संस्कृति की भूमिका, राजभाषा हिन्दी : कुछ विचार, संस्कृति भाषा साहित्य, यह पृथ्वी हमारी भी है, पर्यावरण और समकालीन हिन्दी साहित्य, मानवाधिकार और समकालीन हिन्दी कविता, राजा रवि वर्मा : द कोलोसस ऑफ इंडियन पेंटिंग, (मौलिक); स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में मानवाधिकार, मानवाधिकार की राजनीति, प्रकृति और अन्तर्प्रकृति, हिन्दी का पर्यावरणीय साहित्य, हरित कविता, नेचुरल रिवरबरेशंस (सम्पादित); गंगा, नारायण गुरु की यात्रा, सिद्धार्थ (अनूदित) आदि। इनके अलावा हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक शोध-आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आपने अब तक पाँच शोध परियोजनाएँ पूरी की हैं। उन्हें केरल हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, यूजीसी शोध पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर हिन्दी लेखक पुरस्कार, बालकृष्ण गोयनका अनुवाद पुरस्कार, डॉ. एल. सुनीताबाई ज्ञान पुरस्कार, हिन्दी साहित्य शिरोमणि सम्मान, भारतीय उच्च शैक्षणिक संस्थान, शिमला की एसोसिएट फेलोशिप आदि से सम्मानित किया गया है।

ई-मेल : [email protected]

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