कविता का सम्बन्ध समय, समाज और मनुष्य से है, लेकिन कविताएँ अपनी प्रकृति, संरचना और बुनावट में स्वायत्त होती हैं। कविता में यह आबद्ध होकर भी स्वतंत्र होना किस तरह सम्भव होता है? इसको परिभाषित करना सृजनात्मक प्रक्रिया के विरुद्ध जाना होगा। ऐसा करना अनिवार्य रूप से गतिशील प्रक्रिया के तहत ही सम्भव हो सकता है। कविता के बारे में विचार करते हुए हम एक सरल-सी बात से शुरू कर सकते हैं, लगभग विज्ञान की भाषा में कि जब दो या दो से अधिक भिन्न गुण वाली वस्तुएँ मिलकर एक तीसरी चीज़ बनाती हों, तो वहाँ कविता होगी। कविता के भी अवयव होते हैं। दृश्य-अदृश्य, अन्तर-बाह्य, मनुष्य-प्रकृति के संयोग से ही कविता बनती है। जैसे दो पत्थरों के रगड़ने से आग निकलती है। जब आग पैदा होती है तो प्रत्येक पत्थर का अस्तित्व दूसरे के महत्त्व को स्थापित करता है। किसी एक को अधिक और दूसरे को कम महत्त्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। हर एक का अस्तित्व अपने साथ-साथ दूसरे को प्रकाशित करता है। इसमें स्वयं का होना और स्वयं से मुक्त होना, दोनों ही शामिल है। कविता के प्रसंग में भी यही बात सिद्ध होती है।
कविता के बहाने साहित्य-मात्र को देखने-समझने का सलीका सिखाने वाली एक उल्लेखनीय कृति।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 226p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22.5 X 14 X 2 |