हरिशंकर परसाई के व्यंग्य पर जब कभी मैं सोच-विचार करता हूं, तब मुझे पता नहीं क्यों ‘चूहा और मैं’ नामक लघु कहानी यादों में आ जाती है। कहानी के प्रारंभ में ही प्रस्तुत कहानी को लेख कहते हुए परसाई मजाकिया अंदाज में यह द्योतित करना भी चाहते हैं कि कोई ‘गंभीर’ विचार प्रस्तुत करने जा रहे हैं। कहानी को लेख कहना अपने आप में ‘उलट-बांसी’ है। यह ‘बांसी’ गुरुतर आघात चित्त में करती है। कहानी की शुरूआत गंभीर बन पड़ी है। अपने ज्वलनशील अहम् से आहत आधुनिक मानव के चेहरे पर व्यंग्य कसते हुए आपका कहना है कि “चाहता तो लेख का शीर्षक ‘मैं और चूहा’ रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।” इस कहानी में प्रयुक्त ‘मैं’ सर्वनाम का आपना अलग स्थान है। मुक्तेश्वर तिवारी ‘प्रच्छन्नता का उद्घाटन और परसाई का व्यंग्य’ शीर्षक अपने एक निबंध में लिखते हैं कि “परसाई के ‘मैं’ शैली पर आधारित व्यंग्यों की धार बड़ी पैनी है। इन व्यंग्यों में ‘स्व’ का गौरवान्वयन नहीं; इस ‘स्व’ को अकिंचन रखकर ‘जनता’ के अर्थ का बोध कराना उनका उद्देश्य है, जो आपद-विपद में पड़ी हुई है। कवियों के ‘मैं’ में जिस संघनित सामाजिक बोध को हम समझने लगे हैं, ठीक उसी प्रकार परसाई के व्यंग्यों के ‘मैं’ द्वारा व्यंजित व्यंग्य-नायक बृहत्तर अर्थ में वृहत्तर भारतीय जन के वाचक हो गए हैं। ‘मैं’ का निजत्व या ‘मैं’ से जड़ीभूत घटना-प्रसंग सामाजिक तल्ख सच से टकराकर निर्वैयक्तिक वजूद तक पाठक को घसीट ले जाते हैं। यही ‘मैं’ है जो सामाजिक ताने-बाने से टकराता है और ठीक-बेठीक की शिनाख्त करवाता है।”
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 242p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22.5 X 14 X 2 |