रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिन्दी के महान कवि तो हैं ही, वे बहुत बड़े निबन्ध लेखक भी हैं। उनके निबन्ध अपने भाष्य में सिर्फ़ पाठ के लिए आकर्षित नहीं करते, बल्कि अपने युग के साहित्य, समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास आदि को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि भी देते हैं; और इस बात का एक सशक्त उदाहरण है यह पुस्तक ‘काव्य की भूमिका’।
इस संग्रह में दिनकर के ग्यारह विचारोत्तेजक निबन्ध शामिल हैं। ‘रीतिकाल का नया मूल्यांकन’, ‘छायावाद की भूमिका’, ‘छायावादोत्तर काल’, ‘प्रयोगवाद’, ‘कोमलता से कठोरता की ओर’ नामक आरम्भिक निबन्धों में रीतिकाल से लेकर प्रयोगवाद तक की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन किया गया है। ‘भविष्य की कविता’ निबन्ध में यह समझाने की चेष्टा की गई है कि वैज्ञानिक युग में कविता अपने किन गुणों पर जोर देकर अपना अस्तित्व कायम रख सकती है। ‘कविता ज्ञान है या आनन्द?’, ‘रूपकाव्य और विचारकाव्य’, ‘प्रेरणा का स्वरूप’, ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’, ‘कविता की परख’ निबन्ध युवाशक्ति के नाम कवि का सन्देश हैं।
कविता और काव्य-समीक्षा से सम्बन्धित दो-तीन विचार ऐसे हैं जो दिनकर के अन्य निबन्धों में दिख जाते हैं। पुनरावृत्ति का दोष सुधी पाठकों को पहली नज़र में भले ही खटकेगा, लेकिन वे इस तथ्य को भी रेखांकित करने से नहीं चूकेंगे कि यहाँ निबन्धों की केन्द्रीय चेतना में उनकी अपनी एक अलग अनिवार्यता और भूमिका है।
उच्चकोटि के साहित्य के विद्यार्थियों तथा काव्य-प्रेमियों के लिए कवि दिनकर की यह कृति एक ऐसी रोशनी की तरह है जिसमें बहुत कुछ अनदेखा देखा जा सकता है, बहुत कुछ अनसुलझा सुलझाया जा सकता है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2010 |
| Edition Year | 2022, Ed. 2nd |
| Pages | 174p |
| Price | ₹695.00 |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 21 X 14.5 X 1.5 |
Author: Ramdhari Singh 'Dinkar'
रामधारी सिंह ‘दिनकर’
जन्म : 23 सितम्बर, 1908 को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक गाँव में हुआ था। शिक्षा मोकामा घाट तथा फिर पटना में हुई, जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी.ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की। एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-सम्पर्क के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया। 1924 में पाक्षिक ‘छात्र सहोदर’ (जबलपुर) में प्रकाशित कविता से साहित्यिक जीवन का आरम्भ।
प्रमुख कृतियाँ : कविता–रेणुका, हुंकार, रसवन्ती, कुरुक्षेत्र, सामधेनी, बापू, धूप और धुआँ, रश्मिरथी, नील कुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोयला और कवित्व, हारे को हरिनाम आदि। गद्य–मिट्टी की ओर, अर्धनारीश्वर, संस्कृति के चार अध्याय, काव्य की भूमिका, पन्त, प्रसाद और मैथिलीशरण, शुद्ध कविता की खोज, संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ आदि।
सम्मान : 1959 में संस्कृति के चार अध्याय के
लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय की तरफ से डॉक्टर ऑफ लिटरेचर
की मानद उपाधि। 1973 में उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार। भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित।
निधन : 24 अप्रैल, 1974