वैर नहीं, प्रीत नहीं, फिर भी यह थकन
किसकी भूल भोग रहा, मेरा ही यह मन
यह संगीत की लहरियों में डूबती-उतराती भाषा में लिखे बेहद कोमल भाव हैं। पंडित अमरनाथ जी, जिन्हें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के शीर्षस्थ गायकों में गिना जाता है; वे लिखते भी थे। लय के मनन के साथ आंतरिक अनुभूति और संगीत में महसूस होते असीम के साहचर्य से निकले ये शब्द, जीवन के शाश्वत दुख और सर्जना के सुख से ओतप्रोत हैं। उन्हें जितना पढ़ना है, उससे कहीं ज़्यादा महसूस करने की ज़रूरत है।
‘सुख घिनौने दुख सलोने’—जब कोई साधक यह कहता है तो वह कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, जग को जैसा वह है, वैसा देखकर, समझकर की गई जीवन की समीक्षा है।
आगे एक पंक्ति वे और कहते हैं कि ‘सुख के कारण दुखिया होते देखे अगणित ज्ञानी’, तो सुख और दुख की उस पहेली में ज्ञान की अभिमानी भूमिका भी प्रश्नांकित हो जाती है। वह ज्ञान जो कहता है कि मैं ही सब जानता हूँ, मुझे महसूस करने की आवश्यकता नहीं।
लेकिन अन्तस के अनुभव बिना ज्ञान भी कहाँ पूरा होता है। सूखे ज्ञानवालों का तो कुछ इसी तरह होता है कि,
बिन छाने डीक गए
बूँद-बूँद ख़ून की
वो जो पीते रहे
पानी तक छान के।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 176p |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 20 X 13 X 1 |