Kavya Ki Bhumika

Literary Criticism
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Kavya Ki Bhumika
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‘काव्‍य की भूमिका’ साहित्यिक निबन्‍धों की एक महत्त्वपूर्ण पुस्‍तक है। इसमें दिनकर ने अपने काव्‍य-युग का गहन आकलन प्रस्‍तुत किया है।
‘रीतिकाल का नया मूल्यांकन’ में उन्‍होंने उन प्रमुख प्रवृत्तियों को विश्‍लेषित किया है जिनकी अनदेखी की गई। ‘छायावाद की भूमिका’ में छायावाद की ख़ामियों और उनके कारणों की पड़ताल की गई है, वहीं ‘छायावादोत्तर काल’ में काव्‍य-विशेषताओं पर गहन विचार प्रस्‍तुत किया गया है। ‘प्रयोगवाद’ में दिनकर मानते हैं कि जब प्रगतिवाद के नाम पर मूल्यों का ह्रास होने लगा, तब हिन्दी में कला और शैली के महत्त्व के लिए जो बड़ा प्रयास किया गया, वही प्रयोगवाद बना।
‘कोमलता से कठोरता की ओर’ में वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य में भाषा, शैली और विषयों पर विमर्श है। ‘भविष्‍य की कविता’ में इस बात पर ज़ोर है कि वैज्ञानिक युग में कविता अपने किन गुणों को साथ रख अपना अस्तित्व क़ायम रख सकती है। ‘कविता ज्ञान है या आनन्द ?’ का मूल यह है कि कविता केवल ज्ञान है या आनन्‍द। अगर दोनों है तो उसके अपने विशेष गुण क्‍या हो सकते हैं। ‘रूपकाव्य और विचारकाव्य’ में उनके अन्‍तर को उद्धरणों सहित परिभाषित किया गया है। ‘प्रेरणा का स्वरूप’ में प्रेरणा लौकिक है या अलौकिक पर विवेचन है। ‘सत्यं, शिवं, सुन्दरम्’ में सार-तत्त्व यह है कि कला का सर्वोपरि धर्म सौन्दर्य है, पर सर्वोत्तम कलाकृति वह है जो सुन्दर होने के साथ सत्य भी हो और शिव भी। ‘कविता की परख’ में दिनकर का निष्‍कर्ष है कि कवियों की वैयक्तिक विशेषता ही उनकी नवीनता और मौलिकता होती है।
निस्‍सन्‍देह, इस पुस्‍तक में काव्‍यकर्म, काव्‍य-आन्‍दोलनों और उनसे जुड़े तमाम तत्त्वों को केन्‍द्र में रख जिस आलोचकीय दृष्टि के साथ आकलन किया गया है, वह वैज्ञानिकता में समृद्ध करनेवाला, क्रियात्‍मकता में प्रभावशाली और आस्‍वाद में एक अलग ही रूप, रस और गंध से भर देनेवाला है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1958
Edition Year 2022, Ed. 2nd
Pages 147p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21 X 14.5 X 1.5
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Editorial Review

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Ramdhari Singh Dinkar

Author: Ramdhari Singh Dinkar

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जन्म : 23 सितम्बर, 1908 को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक गाँव में हुआ था। शिक्षा मोकामा घाट तथा फिर पटना में हुई, जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी.ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की। एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-सम्पर्क के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया। 1924 में पाक्षिक ‘छात्र सहोदर’ (जबलपुर) में प्रकाशित कविता से साहित्यिक जीवन का आरम्भ।

प्रमुख कृतियाँ : कविता–रेणुका, हुंकार, रसवन्ती, कुरुक्षेत्र, सामधेनी, बापू, धूप और धुआँ, रश्मिरथी, नील कुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोयला और कवित्व, हारे को हरिनाम आदि। गद्य–मिट्टी की ओर, अर्धनारीश्वर, संस्कृति के चार अध्याय, काव्य की भूमिका, पन्त, प्रसाद और मैथिलीशरण, शुद्ध कविता  की  खोज, संस्मरण  और श्रद्धांजलियाँ आदि।

सम्मान : 1959 में संस्कृति के चार अध्याय के
लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय की तरफ से डॉक्टर ऑफ लिटरेचर  
की मानद उपाधि। 1973 में उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार। भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्‍मानित।
निधन : 24 अप्रैल, 1974

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