Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Rajneeti

Author: Arvind Mohan
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Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Rajneeti
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दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के विपरीत भारत में निर्धन, ग्रामीण और दलित-दमित लोगों की चुनावी भागीदारी एक विशेष परिघटना है,‍ जिसे राजनीति-विज्ञानी रजनी कोठारी जाति और लोकतंत्र की अर्न्तक्रिया से आया बदलाव मानते हैं। उनका मानना था कि जाति और लोकतांत्रिक राजनीति की उथल-पुथल के बीच समाज में बदलाव की एक सकारात्मक धारा गतिमान रहती है।

यह किताब मोटे तौर पर इसी स्थापना को लेकर चलती है। इसमें संकलित आलेख भारत में जाति व्यवस्था के अहम पड़ावों, उससे जुड़े तर्क-वितर्क और जाति को समझने की जद्दोजहद को सामने लाते हैं। चुनावों में उसकी भूमिका का विश्लेषण भी इसमें है। जाति के गुण-दोषों की विवेचना करनेवाले, उसके परिणामों को रेखांकित करते बाबा साहब, लोहिया और किशन पटनायक के लेख भी इसमें शामिल हैं। गांधी जाति को लेकर कैसे सोचते थे, और इसे लेकर आगे अपने जीवनकाल में क्या करना चाहते थे, इस विषय में भी पुस्तक का एक लेख विचारणीय बिन्दु प्रस्तुत करता है।

इस समय जब अपनी पहचानों को लेकर बढ़ती सजगता समाज के हर स्तर पर गहरी बेचैनी पैदा कर रही है, और तकनीक के रास्ते पर तेजी से बढ़ती दुनिया में अपनी अस्मिता को बचाए-बनाए रखने की नई चुनौती सामने है, अपनी उस सामाजिक संरचना को समझना निश्चय ही उत्तेजक होगा, जिसके लिए पूरी दुनिया भारत को आश्चर्य से देखती है। यह किताब हमें इस दिशा में काफी आगे तक ले जाती है। 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 288p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Arvind Mohan

Author: Arvind Mohan

अरविन्द मोहन

अभी इंडिया न्यूज चैनल के सम्पादकीय सलाहकार का काम कर रहे अरविन्द मोहन पिछले चालीस साल से ज्यादा समय से पत्रकारिता में जमे हुए हैं। ‘जनसत्ता’, ‘इंडिया टुडे’, ‘हिन्दुस्तान’ और ‘अमर उजाला’ के बाद वे ‘एबीपी’ न्यूज से जुड़े रहे हैं। वे तीन साल तक सीएसडीएस में सम्पादक थे। लेकिन इसी के बीच समय-समय पर छुट्टी लेकर या साथ-साथ समाज विज्ञान के विषयों पर काम किए हैं या लगभग दर्जन गम्भीर किताबों का अनुवाद किया है या इतनी ही किताबों का सम्पादन किया है। अभी उनका मुख्य अध्ययन गांधी पर केन्द्रित है। चुनाव और जाति के सम्बन्धों पर उनकी खास दिलचस्पी रही है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापक के रूप में मीडिया के छात्रों का अध्यापन भी करते रहे हैं।

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