Bihari Mazdooron Ki Peeda

Sociology
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ISBN:9788183618465
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Bihari Mazdooron Ki Peeda
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मज़दूरों का विस्थापन न तो अकेले भारत में हो रहा है, न आज पहली बार। सभ्यता के प्रारम्भ से ही कामगारों-व्यापारियों का आवागमन चलता रहा है, लेकिन आज भूमंडलीकरण के दौर में भारत में मज़दूरों को प्रवासी बनानेवाली स्थितियाँ और वजहें बिलकुल अलग क़‍िस्म की हैं। उनका स्वरूप इस क़दर अलग है कि उनसे एक नए घटनाक्रम का आभास होता है। ज्ञात इतिहास में शायद ही कभी, लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में मज़दूर अपना घर-बार छोड़कर कमाने, पेट पालने और अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए बाहर निकल पड़े हों।

देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार और सबसे विकसित राज्य पंजाब के बीच मज़दूरों की आवाजाही आज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है। यह संख्या लाखों में है। पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ के शहरी-ग्रामीण जीवन में बिहार के 'भैया' मज़दूर अनिवार्य अंग बन गए हैं और बिहार के सबसे पिछड़े इलाक़ों के जीवन और नए विकास की सुगबुगाहट में पंजाब की कमाई एक आधार बनती जा रही है। यह पुस्तक इसी प्रवृत्ति, इसी बदलाव, इसी प्रभाव के अध्ययन की एक कोशिश है। इस कोशिश में लेखक के साल-भर गहन अध्ययन, लम्बी यात्राओं और मज़दूरों के साथ बिताए समय से पुस्तक आधिकारिक दस्तावेज़ और किसी रोचक कथा जैसी बन पड़ी है।

पंजाब और बिहार के बीच शटल की तरह डोलते मज़दूरों की जीवन-शैली की टोह लेती यह कथा कभी पंजाब का नज़ारा पेश करती है तो कभी बिहार के धुर पिछड़े गाँवों का। शैली इतनी रोचक और मार्मिक है कि लाखों प्रवासी मज़दूरों और पंजाब पर उनके असर के तमाम विवरणों का बखान करती यह पुस्तक कब ख़त्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2017
Edition Year 2017, Ed. 1st
Pages 172p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Arvind Mohan

Author: Arvind Mohan

अरविन्द मोहन

पढ़ाई के दौरान आधुनिक भारत के इतिहास में गहरी रुचि रखनेवाले अरविन्द मोहन ने 1982 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री पाई और उसके बाद से ही आर्थिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया। वे 1983 से प्रकाशित हिन्‍दी दैनिक ‘जनसत्ता’ और फिर 1986 से प्रकाशित पाक्षिक हिन्‍दी समाचार पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ की प्रारभिक टोली के सदस्य रहे। दिसम्‍बर, 1995 में दैनिक ‘हिन्‍दुस्तान’ में सहायक सम्‍पादक पद पर कार्यरत। अपने पत्रकार-जीवन में उन्होंने आर्थिक विषयों के साथ ही प्रायः सभी विषयों पर ख़ूब पढ़ा-लिखा। 1993 में प्रकाशित उनकी सम्‍पादित किताब ‘ग़ुलामी का ख़तरा’ ने नई आर्थिक नीतियों के आलोचनात्मक विश्लेषण की शुरुआत की। 1974 के जेपी आन्‍दोलन से प्रेरित अरविन्द मोहन अब तक चलनेवाली विविध समान्‍तर राजनैतिक गतिविधियों से निकट सम्‍बन्‍ध रखते आए हैं।

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