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Aseem

Author: Abhayanand
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Aseem

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हर अपराध का मूल कारण आमतौर पर आर्थिक होता है, यहाँ तक कि साम्प्रदायिक कहे जानेवाले दंगों का भी; और किसी भी अपराध का निदान केवल बल-प्रयोग से नहीं किया जा सकता, उसके लिए सामाजिक संरचना की पेचीदगियों को, सहानुभूति और न्याय को, अपना उद्देश्य मानकर समझना होगा, पुलिस तो यह कर सकती है। क़ानून की अपनी सीमाओं के बावजूद वह जनता के भीतर वह विश्वास पैदा कर सकती है जो उसके होने को सार्थक बनाए। पुलिस का काम सिर्फ़ उस सम्पत्ति की रक्षा करना नहीं है, जिसके बारे में किसी को यही मालूम नहीं कि उसे अ‌‌र्जित कैसे किया गया है, उसका काम उन लोगों के साथ खड़े दिखना है जो व्यवस्था के शिकार हैं, असहाय हैं।

बिहार कैडर (1977 बैच) के आई.पी.एस. अधिकारी रहे अभयानंद के ये विचार उन्हें एक पुलिस अधिकारी से कुछ ज़्यादा बनाते हैं। सैंतीस वर्षों के अपने सेवाकाल के दौरान पुलिस-प्रशासन और जनसाधारण के आपसी रिश्तों को पुनर्परिभाषित करते हुए उन्होंने कैसे अपनी प्रयोगधर्मिता से क़ानून-व्यवस्था को सुचारू रूप दिया, कैसे अपने अधीनस्थों को भी उनके कर्तव्य के प्रति सजग बनाया और कैसे समाज के अन्तिम व्यक्ति के भीतर भी भरोसा जगाने का प्रयत्न किया—‘असीम’ उसी की कहानी है।

शिक्षा और भौतिकी के प्रति उनका नैस‌र्गिक झुकाव उन्हें हमेशा नये ढंग से सोचने की प्रेरणा देता रहा जिसका एक सुफल ‘सुपर-30’ जैसे विख्यात शैक्षिक प्रयोग के रूप में सामने आया। इसका भी विस्तृत वर्णन वे इस आत्मवृत्त में करते हैं।

मौलिक ढंग से सोचने का साहस देने वाली

एक प्रेरक आत्मकथा!

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 328p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2
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Abhayanand

Author: Abhayanand

अभयानंद

बिहार कैडर (1977 बैच) के आई.पी.एस. अधिकारी रहे अभयानंद ने डी.जी.पी. के रूप में बिहार पुलिस का नेतृत्व किया। अपने अनोखे अन्दाज़ में उन्होंने विभाग में अनदेखे-अनसुने आविष्कारों से अपनी एक अलग पहचान बनाई। समाज उन्हें एक समाज-सेवी और शिक्षाविद् के रूप में भी जानता है।

‘सुपर 30’ के माध्यम से उन्होंने पिछले बीस वर्षों में असंख्य ग़रीब मेधावी विद्यार्थियों के जीवन का नव-निर्माण किया है। 2015 में सेवानिवृत्ति के पश्चात वे शहर की भीड़भाड़ से दूर, प्रकृति की गोद में निवास करते हैं और जनहित की ओर प्रयासरत हैं। बच्चों को पढ़ाने के अतिरिक्त आजकल बिहार के कृषि-संस्कार और उससे जुड़े स्वास्थ्य पोषण के सुधार में जुटे हैं। इस कार्य में उनका आह्वान उनकी सुपुत्री ऋचा ने किया है। उनका मानना है कि पारम्परिक खान-पान की पुनःस्थापना अत्यन्त आवश्यक है जिससे सम्भवतः समाज में हो रहे स्वास्थ्य तथा संस्कृति सम्बन्धी क्षरण को रोका जा सकता है।

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