बहे सो गंगा सामान्यतः जल के आसन्न विश्वव्यापी संकट और विशेषतः भारत में गंगा और अन्य नदियों के सामने मौजूद ख़तरे को संबोधित सिर्फ़ एक किताब नहीं बल्कि एक चेतावनी है। लगातार बढ़ती जनसंख्या, प्रकृति का दोहन करनेवाली विकास-परियोजनाएँ, पानी के समुचित संरक्षण को लेकर समाज और सरकारों की लापरवाही, पर्यावरण असन्तुलन, जलवायु परिवर्तन, और अन्य अनेक कारणों से दुनिया-भर की नदियों में पानी कम हो रहा है। वे नदियाँ जो पूरे साल बहा करती थीं, मौसमी नदियों में बदल गई हैं।
अनेक शोध-सर्वेक्षणों, सरकारी-गैरसरकारी रिपोर्टों और निजी स्तर पर किए गए राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय अध्ययनों का उपयोग करते हुए लिखी गई यह किताब इस सवाल पर केंद्रित है कि क्या नदियाँ मर जाएँगी!
लेखक की चिन्ता है कि इस मुद्दे पर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाहों को अनदेखा किया जा रहा है, और सारा ध्यान फौरी फायदों तक सिमटकर रह गया है। वे कहते हैं कि ऐसा समय आ सकता है जब मुफ्त बिजली और वाई-फाई के बजाय राजनीतिक दल रसोई और पीने के लिए पर्याप्त जल के नाम पर वोट माँगेंगे!
नदियों के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आयामों और उनके चिन्ताजनक भविष्य पर साथ-साथ विचार करती हुई यह तथ्यपरक किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 320p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 19.5 X 13 X 2 |