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Chakravyuh

Edition: 2024, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Chakravyuh

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“महाराज, जब मैं सुदेश की प्रजा को मिट्टी और फूस के मकानों में रहते देखती हूँ तो मुझे यह संगमरमर का महल काट खाने को दौड़ता है; जब मैं उन्हें सूखी रोटियाँ खाते देखती हूँ तो सोलह प्रकार के व्यंजन मुझे विषतुल्य लगते हैं। मैं भगवान शंकर से हमेशा यही प्राथना करती हूँ कि वह हमारी प्रजा को हर तरह से समृद्धि दें। महाराज, प्रजा की चिन्ता अक्सर रातों को मेरी नींद चुरा लेती है। राजधानी देवल के उत्तर देवदार वृक्षों के जंगल के बीच मैंने इसी उद्देश्य से एक तंत्रगृह बनवाया है कि मैं गुणियों और सिद्धों से उचित परामर्श कर सुदेश की जनता के कल्याण के लिए उचित उपाय ढूँढ़ सके। मैं जानती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे विरुद्ध गन्दे प्रचार करते रहते हैं। वे मुझे, एक साधारण को जो न बहुत लम्बी है और न बहुत नाटी, न बहुत मोटी है और न पतली, न बहुत गोरी है और न बहुत काली, अपने अमर्ष का शिकार बनाने पर तुले हैं। लेकिन मैं अपने सुख-दुख की चिन्ता कभी नहीं करती, और न इस बात की परवाह करती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे बारे में क्या सोचते हैं और कहते हैं। मैं या तो अपने अन्तःकरण की आवाज सुनती हूँ या सुदेश की साधारण जनता की, क्योंकि मैं जानती हूँ कि लोक-मंगल से बढ़कर अन्य कोई सुकर्म नहीं है।”

—इसी पुस्तक से

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 344p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Author: Jagdish Prasad Singh

जगदीश प्रसाद सिंह

क़रीब चार दशकों तक अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक रहने के बाद कुछ वर्ष पहले सेवानिवृत्त हुए। अपने सेवा-काल के अन्तिम तेरह वर्षों तक ये मगध विश्वविद्यालय, बोधगया (बिहार) के अंग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष रहे।

अंग्रेज़ी में इनकी तीन आलोचनात्मक पुस्तकें और तीन उपन्यास प्रकाशित हैं। हिन्दी में इनके चार उपन्यास और तीन कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं।

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