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Uddhwast Dharmashala Tatha Anya Natak

Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Uddhwast Dharmashala Tatha Anya Natak

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गोविन्द पुरुषोत्तम देशपाण्डे आधुनिक मराठी नाट्य-जगत के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। ‘उद्ध्वस्त धर्मशाला तथा अन्य नाटक’ पुस्तक में उनके तीन बहुचर्चित नाटकों को रखा गया है—उद्ध्वस्त धर्मशाला, मामका : पाण्डवाश्चैव तथा एक बज चुका है। मराठी रंगमंच को इन नाटकों ने दूर तक प्रभावित किया है और इनका हिन्दी रूपान्तरण रंगकर्म से जुड़े तीन सुपरिचित रचनाकारों के द्वारा किया गया है।

कथ्य और शिल्प की दृष्टि से ये तीनों ही नाटक भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग (जिसमें रंगकर्मी भी शामिल हैं) के वैचारिक धुँधलके और उसकी काल्पनिक क्रान्तिकारिता पर तीखे कटाक्ष करते हैं। आधुनिक भारतीय युवावर्ग पश्चिम के जिस भोगवादी नजरिये का शिकार है, उसने सामाजिक बदलाव की तमाम सम्भावनाओं को धूमिल कर दिया है। इस तथ्य को लेखक ने गहरी पीड़ा और संवेदना के साथ उकेरा है। उसने साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति—यथास्थितिवाद की शिकार वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में—इन सभी की प्रासंगिकता पर अनेक सार्थक सवाल उठाये हैं। ये नाटक निश्चय ही हिन्दी रंगमंच को एक नये अनुभव-जगत से गुजरने का अवसर प्रदान करेंगे। 

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 160p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Govind Purushottam Deshpandey

Author: Govind Purushottam Deshpandey

गोविन्द पुरुषोत्तम देशपाण्डे

मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार गोविन्द पुरुषोत्तम देशपाण्डे का जन्म 2 अगस्त, 1938 को नासिक, महाराष्ट्र में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा रहिमतपुर, सतारा में और परवर्ती शिक्षा क्रमश: बड़ौदा, पुणे और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में पूरी हुई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अन्तरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, में चीनी अध्ययन के प्रोफ़ेसर रहे। चीनी मामलों और अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं पर अंग्रेज़ी और मराठी में महत्त्वपूर्ण लेखन किया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘उद् ध्वस्त धर्मशाला’, ‘एक वाजून गेला आहे’, ‘मामका: पांडवाश्चैव’, ‘अस्सा नवरा सुरेख बाई!’, ‘अन्धार यात्रा’ (नाटक); ‘इत्यादि, इत्यादि कविता’ (कविता-संग्रह); ‘डायलेक्टिक्स ऑफ़ डि‍फ़ीट : प्रॉब्लम ऑफ़ कल्चर इन पोस्ट कोलोनियल इंडिया (निबन्ध); ‘मॉडर्न इंडियन ड्रामा (सं.)’।

‘उद् ध्वस्त धर्मशाला’ नाटक का हिन्दी के अलावा बांग्ला, कन्नड़ और तमिल में अनुवाद हो चुका है। अन्य नाटक भी हिन्दी में अनूदित हैं। इन नाटकों के कई सफल मंचन भी हुए हैं।

उन्हें 1977 में ‘महाराष्ट्र राज्य सम्मान’ और 1996 में ‘संगीत नाटक अकादेमी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

16 अक्टूबर, 2013 को पुणे, महाराष्ट्र में उनका निधन हुआ। 

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