‘बग़ैर तराशे हुए’ सुधा अरोड़ा का पहला कहानी-संग्रह है, आज जिसकी हैसियत एक दस्तावेज़ की है, और लगभग इसी रूप में इस नए संस्करण को प्रस्तुत भी किया जा रहा है।
वर्ष 1968 में जब यह संग्रह पहली बार प्रकाशित हुआ, उस समय बहुत कम स्त्री-कथाकार थीं, जो बड़े फलक पर सक्रिय थीं, लेकिन यही वह समय था जब देश का युवा स्त्री-समाज शिक्षा के क्षेत्र में अपने शुरुआती क़दम बहुत उम्मीद के साथ रखने लगा था। इन कहानियों में इस बदलाव को आते हुए देखा जा सकता है, साथ ही साठ साल पहले का वह समय भी जब क़स्बों-शहरों और महानगरों की सड़कें, गलियाँ और चौराहे आज वाली रफ़्तार से नहीं, ठहराव, सुकून और लोगों की ऊष्म पारस्परिकता से पहचाने जाते थे। इतने लम्बे वक़्फ़े और बहुमुखी विकास, तथा अप-विकास के भी, इतने तीव्र झंझावातों के बाद इन कहानियों और इनमें निबद्ध समय से गुज़रना हमें एक तरह से कुछ ताज़ा-सा कर जाता है।
जो प्रश्न आज़ादी के साथ ही हमारी सामाजिकता और राजनीति के सामने आ खड़े हुए थे उनको भी ये कहानियाँ अपेक्षित ईमानदारी और साहस के साथ संबोधित करती हैं, मसलन साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और मनुष्य का धीरे-धीरे होता अमानवीकरण।
‘बग़ैर तराशे हुए’ के इस संस्करण में उस दौर की प्रमुख पत्रिकाओं, ‘समीक्षा’, ‘धर्मयुग’ और ‘आवेश’ में प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षाओं से कुछ अंश भी शामिल किए गए हैं, जो इस प्रस्तुति को सम्पूर्ण अध्ययन में बदल देते हैं।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 184p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1 |