Pragya
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प्रज्ञा
दिल्ली में जन्मी प्रज्ञा के ‘तक़सीम’, ‘मन्नत टेलर्स’, ‘रज्जो मिस्त्री’ तथा ‘मालूशाही...मेरा छलिया बुरांश’ शीर्षक से चार कथा-संग्रह हैं। ‘गूदड़ बस्ती’ और ‘धर्मपुर लॉज’ जैसे उनके दो बहुप्रशंसित उपन्यास हैं। तीसरा उपन्यास ‘काँधों पर घर’ आपके हाथों में है। उनके उपन्यास और कहानी संग्रह ‘मीरा स्मृति सम्मान’, ‘महेंद्रप्रताप स्वर्ण सम्मान’, ‘शिवना अन्तरराष्ट्रीय कथा सम्मान’, ‘प्रतिलिपि डॉट कॉम सम्मान’, ‘स्टोरी मिरर पुरस्कार’ से सम्मानित हुए हैं।
‘नुक्कड़ नाटक : रचना और प्रस्तुति’, ‘नाटक से संवाद’, ‘नाटक : पाठ और मंचन’, ‘कथा एक अंक की’ जैसी किताबें नाट्यालोचना केन्द्रित हैं। उनके द्वारा सम्पादित बारह नुक्कड़ नाटक ‘जनता के बीच : जनता की बात’ किताब में शामिल हैं। ‘तारा की अलवर यात्रा’ बाल साहित्य की श्रेणी में प्रथम पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार 2008 से पुरस्कृत है। वैचारिक लेखन से जुड़े लेख प्रज्ञा की किताब ‘आईने के सामने’ में संकलित हैं। लगभग ढाई दशक से प्रज्ञा दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में अध्यापन कर रही हैं। इस समय वे हिन्दी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
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