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Banusnama

Author: Asghar Wajahat
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Banusnama

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उस दिन अचानक मानुस और बानुस आमने-सामने आ खड़े हुए। दरअसल बानुस नाम भी उन्हें मानुसों ने ही दिया। उन्हें तो यह भी मालूम नहीं था कि नाम होता क्या है।

फिर वे जंगल में आस-पास साथ-साथ रहने लगे; और तब उनके बीच के असली फ़र्क सामने आए। बात बस इतनी नहीं थी कि मानुसों ने अपने आगे के दो पैरों को खड़े होकर हाथ बना लिया था, वे उन हाथों से ऐसे काम भी करने लगे थे जिनके बारे में बानुसों को समझ ही नहीं आता कि उन्हें करना ही क्यों है!

पत्थरों को किसलिए तोड़ना है? पेड़ों की टहनियों को पेड़ों से छीनकर घसीटते हुए क्यों कहीं ले जाना है! घोड़ों को बाड़े में किसलिए बंद करना है? और फिर बानुसों को ही ये कह देना कि अब तुम जंगल छोड़कर कहीं और चले जाओ, जहाँ चाहो! क्या बेतुकी बात!

लेकिन बानुसों को भागना पड़ा, मानुसों से बचने के लिए; लेकिन अब मानुसों ने उन्हें पकड़ना शुरू किया और न जाने कहाँ ले जाने लगे...तो बानुसों और मानुसों की यह दास्तान दरअसल प्रकृ‌ति और मनुष्य के द्वंद्व की दास्तान है। दास्तानगोई के रिवायती फ्रेम में कसी यह दास्तान बताती है कि मनुष्य कैसे वाचाल होता गया, और प्रकृति कैसे स्तब्ध; मनुष्य कैसे गतिमान होता गया, और प्रकृति कैसे असहाय; मनुष्य कैसे सामर्थ्यवान होता गया और प्रकृति अपनी अथाह शक्ति के बावजूद कैसे मनुष्य की शक्ति-लालसा का निरीह शिकार!

लेकिन प्रकृति पर मनुष्य की यह विजय क्या सचमुच उतनी स्थायी है, जैसी उसे मालूम पड़ रही है? शायद नहीं! दूसरों को भले जीत ले मनुष्य, अपने भीतर अपने ही ख़िलाफ़ चलने वाले संग्राम से कैसे जीतेगा!     

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 152p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 19.5 X 13 X 1
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Asghar Wajahat

Author: Asghar Wajahat

असग़र वजाहत

असग़र वजाहत का जन्म 5 जुलाई, 1946 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में हुआ। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए., पी-एच.डी. और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पोस्ट डाक्टोरल रिसर्च करने के बाद 1971 से 2011 तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। पाँच वर्षों तक ओत्वोश लोरांड विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी में भी पढ़ाया। यूरोप और अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिये।

पाँच कहानी-संग्रह, तीन उपन्यास, एक उपन्यास त्रयी, दो लघु उपन्यास, दस नाटक, एक नुक्कड़ नाटक-संग्रह और यात्रा-संस्मरण की चार पुस्तकों सहित दो दर्जन से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाएँ कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। ‘बीबीसी हिन्दी’, ‘हंस’ और ‘वर्तमान साहित्य’ के विशेषांकों का अतिथि सम्पादन किया। फ़ि‍ल्मों के लिए पटकथाएँ लिखने के अलावा धारावाहिक और डॉक्यूमेंटरी फ़ि‍ल्में भी बनाई हैं। चित्रकला और पर्यटन में उनकी गहरी रुचि है।

अन्य सम्मानों के अतिरिक्त उन्हें दिल्ली हिन्दी अकादमी का ‘शलाका सम्मान’ (2016), संगीत नाटक अकादमी का ‘श्रेष्ठ नाटककार सम्मान’ (2015) और ‘व्यास सम्मान’ (2021) दिये गए हैं।

इन दिनों स्वतंत्र लेखन।

सम्पर्क : [email protected]

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