वो लकड़ी के तख़्ते पे ऐसे खड़ी है
कि हर पोर कीलों से जैसे जड़ी है
अभी उस का बेटा, अभी उस का शौहर
चलाएँगे ख़ंजर की बौछार उस पर
कभी हाथ के रुख़, कभी पीठ पीछे
कभी सिर के ऊपर तो कंधे के नीचे
तमाशाई साँसों को रोके हुए हैं
तमाशा हर इक बार यूँ देखते हैं
कि जैसे वो पहले-पहल देखते हों
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Kamal Naseem |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 112p |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1 |