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Nadi Phir Bah Chali

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Nadi Phir Bah Chali

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हिमांशु श्रीवास्तव हिन्दी उपन्यास साहित्य में लगभग वही स्थान रखते हैं जो फणीश्वरनाथ रेणु और प्रेमचन्द का है। ग्रामीण यथार्थ को जानने, उसकी बारीकियाँ समझने वाले और आँचलिक शब्दों से हिन्दी भाषा को समृद्ध करने वाले यथार्थवादी कथाकार। लेकिन उन्हें वह चर्चा हासिल नहीं हो पाई जिसके वे पात्र थे। यही कारण रहा कि उनके वे उपन्यास भी जो हिन्दी के लिए गौरव का विषय हैं लम्बे समय तक अनुपलब्ध रहे। ‘नदी फिर बह चली’ भी उनमें से एक है।

‘नदी फिर बह चली’ के केन्द्र में परबतिया, उसका पति जगलाल और वह पूरा ग्रामीण समाज है जो धीरे-धीरे बदल रहा है। परब‌तिया और जगलाल दम्पति की जीवन-यात्रा के बहाने यह उपन्यास पारिवारिक सम्बन्धों, ग्राम-समाज के रीति-रिवाजों, अन्धविश्वासों, ऊँची जातियों के दबदबे, किसान और मजदूरों के कर्जों में बँधे जीवन आदि का बेहद ठहराव के साथ विस्तृत वर्णन करता है।

हिमांशु श्रीवास्तव की असली ताकत उनकी विवरणात्मकता में है। जीवन के एक-एक पहलू, पात्रों की मन:स्थिति, और प‌रिवेश के चित्रण के लिए जैसे उनके पास अकूत शब्द-भंडार है। मुहावरों की, कहावतों की असीम सम्पदा भी। उनका गद्य अत्यन्त परिश्रम के साथ यह प्रयास करता है कि कथा का प्रत्येक दृश्य पाठक की स्मृति का स्थायी हिस्सा हो जाए और समय-विशेष की सामाजिक वास्तविकता का प्रमा‌‌णिक दस्तावेज भी।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 368p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 2.5
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Himanshu Shrivastava

Author: Himanshu Shrivastava

हिमांशु श्रीवास्तव

हिमांशु श्रीवास्तव का जन्म 11 मार्च, 1934 को दिघवारा अंचल के गाँव हराजी, ज़िला सारण, बिहार में हुआ था। उन्होंने मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। पहली कहानी ‘कल्पना’ पत्रिका में छपी। पाँचवें दशक के प्रारम्भ से उपन्यासों का प्रकाशन शुरू हुआ। 1949 में प्रसिद्ध रेडियो नाटक ‘उमर खैयाम’ का आकाशवाणी द्वारा राष्ट्रीय प्रसारण हुआ।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘लोहे के पंख’, ‘नदी फिर बह चली’, ‘भित्तिचित्र की मयूरी’, ‘मन के वन में’, ‘दो आँखों की झील’, ‘कुहासे में जलती धूपबत्ती’, ‘रिहर्सल’, ‘परागतृष्णा’, ‘शोकसभा’, ‘प्रियाद्रोही’, ‘पुरुष और महापुरुष’, ‘पूरा अधूरा पुरुष’, ‘कथासूर्य की नई यात्रा’, ‘पैदल और कुहासा’, ‘नई सुबह की धूप’, ‘इशारा’, ‘न खुदा न सनम’ (उपन्यास); ‘जेलयात्रा’, ‘हंस चुगे सीप से ज्यों मोती’, ‘कथा सुन्दरी’, ‘मुखबिर होने का इरादा’ (कहानी-संग्रह); रेडियो नाटकों के तीन संग्रह और विपुल बाल-साहित्य भी प्रकाशित। उन्हें अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से सम्मानित किया गया।

26 मई, 1996 को पटना में उनका निधन हुआ।

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