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Wo Rain Lili Khilane Ke Din The

Author: Kavita
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Wo Rain Lili Khilane Ke Din The

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वो रेन लिली खिलने के दिन थे

कथाकार कविता की नयी कहानियों का संकलन है। अति-सम्प्रेषण और अकेलेपन से भरे सोशल मीडिया के इस समय में ये कहानियाँ समकालीन स्त्री-अनुभव की उस सघन और जटिल दुनिया में प्रवेश करती हैं, जहाँ निजी जीवन, सामाजिक संरचनाएँ और समय की नई चुनौतियाँ एक-दूसरे से लगातार टकराती रहती हैं।

संवाद के संकट को सूक्ष्मता से पकड़ती ये कहानियाँ विवाह और परिवार जैसी संस्थाओं को चेतना और निर्णय के संयुक्त धरातल पर पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करती हैं और स्त्री के सम्मान और पहचान जैसे जटिल राजनैतिक प्रश्नों को दैनिक जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में गहरे उतरकर सम्बोधित करती हैं।

कविता इन कहानियों में बाहरी घटनाओं से अधिक उस भीतरी भूगोल को रेखांकित कर रही हैं, जहाँ स्त्री का मन, स्मृति और विवेक सामाजिक संरचनाओं से निरन्तर संवाद और संघर्ष में रहते हैं। यह उस नई बनती स्त्री की दुनिया है जो स्वयं को किसी एक भूमिका में सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि अपने लिए नए अर्थ और नए रास्ते तलाश कर रही है।

संग्रह की कुछ कहानियों में महामारी के दौर का विस्थापन, भय और असुरक्षा भी दर्ज है, जहाँ पीड़ा है, अनिश्चितता है, मृत्यु है लेकिन उसके समानान्तर जीवन को थामे रखने की जिद भी है।

प्रवाहमान और सघन स्त्री-भाषा में रची गई ये कहानियाँ एक नए और सम्भावनाशील समाज की ओर संकेत करती हैं, खासकर स्त्री के सन्दर्भ में।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 176p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1.5
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Author: Kavita

कविता

कविता का जन्म 15 अगस्त को मुजफ्फरपुर बिहार में हुआ। हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर और राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली से भारतीय कलानिधि। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं।

उनकी प्रकाशित कृतियाँ—‘मेरी नाप के कपड़े’, ‘उलटबाँसी’, ‘नदी जो अब भी बहती है’, ‘आवाजों वाली गली’, ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, ‘माई री’, ‘गौरतलब कहानियाँ’, ‘मैं और मेरी कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘मेरा पता कोई और है’, ‘ये दीये रात की ज़रूरत थे’ (उपन्यास); ‘मैं हंस नहीं पढ़ता’, ‘वह सुबह कभी तो आएगी’, ‘जवाब दो विक्रमादित्य’ तथा ‘अब वे वहाँ नहीं रहते’ (सम्पादन)। उनकी कुछ कहानियाँ अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित हैं।

उन्हें कविता और निबन्ध लेखन के लिए बिहार सरकार द्वारा ‘युवा पुरस्कार’ (1993), ‘मेरी नाप के कपड़े’ के लिए ‘अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार’ (2004), ‘क से कहानी घ से घर’ के लिए ‘स्पंदन सम्मान’ (2022) तथा बिहार सरकार द्वारा ‘विद्यापति पुरस्कार’ (2023) से सम्मानित किया गया है।

सम्पर्क : [email protected] 

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