Aawazon Ke Ghere

Poetry
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Aawazon Ke Ghere
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अपने आप से, अपने परिवेश और व्यवस्था से नाराज़ कवि के रूप में दुष्यन्त कुमार की कविताएँ हिन्दी का एक आवश्यक हिस्सा बन चुकी हैं। आठवें दशक के मध्य और उत्तरार्ध में अपनी धारदार रचनाओं के लिए बहुचर्चित दुष्यन्त जिस आग में होम हुए, उसे उनकी रचनाओं में लम्बे समय तक महसूस किया जाता रहेगा।

‘आवाज़ों के घेरे’ दुष्यन्त कुमार का एक ज़रूरी कविता-संग्रह है। इसमें धुआँ-धुआँ होती उस शख़्सियत को साफ़ तौर पर पहचाना जा सकता है, जिसे दुष्यन्त कहा जाता है। समग्रत: ये विरोध की कविताएँ हैं लेकिन रचनात्मक स्तर पर कवि का यह विरोध व्यवस्था से अधिक अपने आप से है, जहाँ व्यक्ति न होकर वह एक वर्ग है—मुट्ठियों को बाँधता और खोलता। बाँधना, जो उसकी ज़रूरत है और खोलना, मजबूरी। एक प्रकार की निरर्थकता और ठहराव का जो बोध इन कविताओं में है, वह सार्थक और गतिशील होने की गहरी छटपटाहट से भरा हुआ है। स्पष्टत: कवि का यही द्वन्द्व और छटपटाहट इन कविताओं का रचनाधाय है, जिसे सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मिली है।

दुष्यन्त लय के कवि हैं, इसलिए मुक्तछन्द होकर भी ये कविताएँ छन्दमुक्त नहीं हैं। साथ ही यहाँ उनके कुछ गीत भी हैं और बाद में सामने आई बेहतरीन ग़ज़लों की आहटें भी। संक्षेप में, यह संग्रह दुष्यन्त की असमय समाप्त हो गई काव्य-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1963
Edition Year 2021, Ed. 9th
Pages 88p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Editorial Review

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Dushyant Kumar

Author: Dushyant Kumar

दुष्यन्त कुमार

जन्म : 1 सितम्बर, 1933; राजपुर-नवादा, ज़िला—बिजनौर (उ.प्र.)।

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), इलाहाबाद।

प्रकाशित कृतियाँ : कविता-संग्रह—‘सूर्य  का  स्वागत’, ‘जलते हुए वन का वसन्त’, ‘आवाज़ों के घेरे’; उपन्यास : ‘छोटे-छोटे सवाल’, ‘दुहरी ज़िन्दगी’ और ‘आँगन में एक वृक्ष’; नाटक—‘मसीहा मर गया’, ‘मन के कोण’ (एकांकी); नाट्य-काव्य—‘एक कण्ठ विषपायी’। ‘साये में धूप’ उनका अन्तिम तथा अत्यन्त चर्चित ग़ज़ल-संग्रह है।

इसके अलावा कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें, कुछ उपन्यास (जिन्हें ख़ुद दुष्यन्त कुमार 'फ़ालतू’ कहते थे) लिखे तथा कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के अनुवाद भी किए।

निधन : 30 दिसम्बर, 1975; भोपाल (म.प्र.)।

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