Aalochak Ke Mukh Se

Literary Criticism
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ISBN:9788126710034
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Aalochak Ke Mukh Se
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इस पुस्तक में संकलित नामवर जी के पाँच व्याख्यान पटना में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के मंच से विभिन्न अवसरों पर दिए गए हैं। इन व्याख्यानों को सम्पादित करते हुए भी व्याख्यान के रूप में ही रहने दिया गया है, ताकि पाठक नामवर जी की वक्तृत्व कला का आनन्द भी ले सकें।

नामवर जी हिन्दी के सर्वोत्तम वक्ता रहे और माने भी जाते रहेंगे। उनके व्याख्यान में भाषा के प्रवाह के साथ विचारों की लय है। इस लय का निर्माण विचारों के तारतम्य और क्रमबद्धता से होता है। अनावश्यक तथ्यों और प्रसंगों से वे बचते हैं और रोचकता का भी ध्यान हमेशा रखते हैं।

आज के साहित्य, विचारधारा, सौन्दर्य, राजनीति और आलोचना से जुड़े तथा उनके अन्तरसम्बन्धों के बारे में महत्त्वपूर्ण बातें इन व्याख्यानों में कही गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘आलोचक के मुख से’ हिन्दी आलोचना की एक बेहद महत्त्वपूर्ण किताब है।

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Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2005
Edition Year 2016, Ed. 2nd
Pages 106P
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
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Editorial Review

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Namvar Singh

Author: Namvar Singh

नामवर सिंह

 जन्म-तिथि : 28 जुलाई, 1926; जन्म-स्थान : बनारस ज़ि‍ले का जीयनपुर नामक गाँव। प्राथमिक शिक्षा बग़ल के गाँव आवाजापुर में। कमालपुर से मिडिल। बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल से मैट्रिक और उदयप्रताप कॉलेज से इंटरमीडिएट। 1941 में कविता से लेखक जीवन की शुरुआत। पहली कविता उसी साल 'क्षत्रियमित्र’ पत्रिका (बनारस) में प्रकाशित। 1949 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. और 1951 में वहीं से हिन्दी में एम.ए.। 1953 में उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अस्थायी पद पर नियुक्ति। 1956 में पीएच.डी. ('पृथ्वीराज रासो की भाषा’)। 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार। चुनाव में असफलता के साथ विश्वविद्यालय से मुक्त। 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय (म.प्र.) के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन। 1965 में 'जनयुग’ साप्ताहिक के सम्पादक के रूप में दिल्ली में। इस दौरान दो वर्षों तक राजकमल प्रकाशन (दिल्ली) के साहित्यिक सलाहकार। 1967 से 'आलोचना’ त्रैमासिक का सम्पादन। 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय (राजस्थान) के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष-पद पर प्रोफ़ेसर के रूप में नियुक्त। 1971 में 'कविता के नए प्रतिमान’ पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार। 1974 में थोड़े समय के लिए क.मा.मुं. हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक। उसी वर्ष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (दिल्ली) के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफ़ेसर के रूप में योगदान। 1987 में वहीं से सेवा-मुक्त। अगले पाँच वर्षों के लिए वहीं पुनर्नियुक्ति। 1993 से 1996 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष। आलोचना त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति रहे। वे ‘आलोचना’ त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक भी रहे।

प्रमुख कृतियाँ : ‘बकलम ख़ुद’, ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’, ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी : नई कहानी’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘दूसरी परम्परा की खोज’, ‘वाद विवाद संवाद’, ‘आलोचक के मुख से’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’, ‘ज़माने से दो दो हाथ’, ‘कविता की ज़मीन ज़मीन की कविता’, ‘प्रेमचन्द और भारतीय समाज’ (आलोचना); ‘कहना न होगा’ (साक्षात्कार); ‘काशी के नाम’ (पत्र) आदि।

‘रामचन्‍द्र शुक्‍ल रचनावली’ सहित अनेक पुस्तकों का सम्पादन।

निधन : 19 फरवरी, 2019

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