‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : हाशिए का समाज और हिन्दी उपन्यास’ वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जहाँ इतिहास-चेतना, राजनीतिक-दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता को आलोचनात्मक विश्लेषण की अनिवार्य दृष्टि बनाकर सत्ता-संरचना की जटिलताओं से वैचारिक मुठभेड़ की गई है। इस प्रक्रिया में वे जिस वैचारिक सजगता के साथ मुख्यधारा बनाम हाशिया, वर्चस्व बनाम प्रतिरोध, दमन बनाम संघर्ष की अपरिहार्य द्वन्द्वात्मक टकराहट की बारीकियों को पकड़ती हैं, उतनी ही प्रखरता के साथ विचार एवं अस्तित्व की गतिशील निर्मितियों को समय की सांस्कृतिक विकास-यात्रा के प्रमुख पड़ावों की तरह परखती हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना-दृष्टि का वितान सभ्यता-समीक्षा के गहन नैतिक दायित्व का दृष्टान्त बन जाता है।
हिन्दी व हिन्दीतर उपन्यासों के विखंडनपरक विश्लेषण के क्रम में यह पुस्तक किसानों, आदिवासियों, स्त्रियों, थर्ड जेंडर और झोंपड़पट्टी समाज के संघर्ष की विडम्बनात्मक ध्वनियों के समानान्तर सत्ता-संरचना के विविध उपकेन्द्रों की कूटनीतिक रणनीतियों को ही उजागर नहीं करती, साहित्य को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का सक्रिय और जवाबदेह उपकरण भी बनाती है। इसलिए यहाँ उपन्यास कंटेंट के मालगोदाम की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र वैचारिक कलाकृति की तरह विश्लेषित किये गए हैं। ‘पाठ’ के रूप में उभरते विश्लेषण को अर्थ-निर्माण की रचनात्मक प्रविधि का रूप देना, भाषा में बहुव्यंजक अर्थध्वनियों को भरना, और संवाद की सहभागिता में पाठक की सक्रियता को शामिल करना इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
ज़ाहिर है कि इस पुस्तक को पढ़ना हमारे समय की प्रश्नाकुल बेचैनियों को आलोचनात्मक विवेक के साथ जाँचना है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 344p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 2 |