विनय दुबे के शिल्प की विशेषता है संक्षिप्तता, जिसके चलते उनकी पंक्तियाँ ज़्यादा बेधक और स्मरणीय हो जाती हैं। घर-परिवार, गली-मुहल्ले, धूप-हवा के सूक्ष्म अवलोकनों से वे इसी संयम के साथ सभ्यता के व्यापक विमर्श को खोलते हैं। राजनीतिक और सामाजिक हलक़ों में सत्ता तथा शक्ति के केन्द्र बड़ों का विरोध वे स्वभावतः और अनायास ही करते हैं, दूसरी तरफ़ सामाजिक जीवन के वे चित्र जो हमें बहुत आम लग सकते है उनके शिल्प का हिस्सा होकर मानव-नियति के बड़े प्रश्नों तक पहुँचने का रास्ता बन जाते हैं। जैसा कि अपनी प्रस्तावना में राजेश जोशी लिखते हैं, अकविता के वातावरण में रहने के बावजूद उनके यहाँ न वैसी अव्यवस्था मिलती है, न भाषा की स्फीति। वे संक्षिप्त और साधारण को उतनी ही जगह में विराट और विशिष्ट कर देते हैं, जितनी जगह उन्हें संगत लगती है। उनकी कविता ने अपने लिए एक अलग रूप चुना जिसमें गम्भीर सरोकार, खिलंदड़ापन, व्यंग्य और हस्तक्षेप अपनी-अपनी भूमिका में सजग खड़े दिखते हैं।
इस पुस्तक में उनके सभी प्रकाशित संग्रहों की कविताएँ ले ली गयी हैं. इसके अलावा वे कविताएँ भी जो अभी तक असंकलित थीं, आपको यहाँ मिलेंगी।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 560p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 3 |