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Sampoorna Kahaniyan : Kashinath Singh

Author: Kashinath Singh
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Sampoorna Kahaniyan : Kashinath Singh

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काशीनाथ सिंह कहानी के लिए जिस चीज़ को सबसे ज़रूरी मानते हैं, वह है जीवन्तता। जीवन की ठस प्रतिकृति नहीं, एक रचना जिसमें उसका अपना जीवन धड़कता हो, जो पाठक को थकाए नहीं, यथार्थ के तीखे चित्र दिखाते हुए भी उसे अपने साथ बनाए रखे। उनकी कहानियों में यह स्पन्दन है। अपना देखा-जाना ग्रामीण जीवन और बनारस का अनूठा परिवेश, उसको जीवन्त बनाने वाले पात्र उनकी कहानियों में अपनी समूची मानवीय जटिलता के साथ दिखाई देते हैं। समय के साथ बदलता यथार्थ कहानी के उनके ट्रीटमेंट को भी बदलता रहा है, लेकिन आम आदमी हमेशा उनके कहानीकार को प्रिय रहा है। उसके दुख-दर्द, असमंजस, दुविधाएँ, उसका जीवट और साहस सब मिलकर उनकी कहानियों को सजीव बनाते हैं। विचारधारा उन्हें दृष्टि ज़रूर देती है, लेकिन जीवन के चित्रण में उनकी सीमा नहीं बनती।

यह उनकी अभी तक की कहानियों की सम्पूर्ण प्रस्तुति है। ‘काशी का अस्सी’ के लेखक की कथा-रचनाओं का यह विशाल फलक पाठकों को निश्चय ही लम्बे समय तक साथ रहनेवाला अनुभव प्रदान करेगा।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 536p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 3.7
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Kashinath Singh

Author: Kashinath Singh

काशीनाथ सिंह

काशीनाथ सिंह का जन्म 1 जनवरी, 1937 को बनारस जि‍ले के जीयनपुर गाँव में हुआ। आरम्भिक शिक्षा गाँव के पास के विद्यालयों में हुई। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. और पी-एच.डी. किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे।

उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘लोग बिस्तरों पर’, ‘सुबह का डर’, ‘आदमीनामा’, ‘नई तारीख’, ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘कल की फटेहाल कहानियाँ’, ‘कहानी उपखान’, ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘घोआस’ (नाटक); ‘हिन्दी में संयुक्त क्रियाएँ’ (शोध); ‘आलोचना भी रचना है’ (समीक्षा); ‘काशी का अस्सी’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘महुआचरित’, ‘उपसंहार’ (उपन्यास); ‘याद हो कि न याद हो’, ‘आछे दिन पाछे गए’, ‘घर का जोगी जोगड़ा’, ‘आहटें सुन रहा हूँ यादों की’ (संस्मरण); ‘गपोड़ी से गपशप’, ‘बातें हैं बातों का क्या’, ‘हंसा करो पुरातन बात’ (साक्षात्कार)।

‘अपना मोर्चा’ का जापानी एवं कोरियाई भाषाओं में अनुवाद हुआ। जापानी में कहानियों का अनूदित संग्रह प्रकाशित। कई कहानियों के भारतीय और अन्य विदेशी भाषाओं में अनुवाद। उपन्यास और कहानियों की रंग-प्रस्तुतियाँ भी हुईं। ‘तीसरी दुनिया’ के लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के सम्मेलन के सिलसिले में नवम्बर, 1981 में जापान-यात्रा।

उन्हें ‘भारत भारती पुरस्कार’, ‘कैफ़ी आज़मी अवार्ड’, ‘कथा सम्मान’, ‘समुच्चय सम्मान’, ‘शरद जोशी सम्मान’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘रचना समग्र पुरस्कार’ और ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

सम्प्रति : बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन। 

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