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Samaychakra-Hard Cover

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संसार के सभी मनुष्यों का पूर्वजन्म और अगला जन्म होता है। पूर्वजन्म की यादें इसलिए भूल जाती हैं क्योंकि प्रत्येक जन्म स्वयं ही इतना विशद और विशाल होता है कि यदि हमें पिछला जन्म याद आ जाए तो इस जीवन का उत्तरदायित्व और भार वहन करना असम्भव हो जाएगा। इसका मतलब यह नहीं कि पूर्वजन्म हम एकदम से विस्मृत कर देते हैं। पूर्वजन्म की स्मृति हमारे अवचेतन में निरन्तर दबी रहती है जो कभी-कभी याद आ जाती है। हमारे साथ जो कुछ भी हो रहा है वह हमारे पिछले कर्मों के आधार पर हो रहा है और भविष्य में जो कुछ भी हमारे साथ होगा वह हमारे वर्तमान कर्मों के आधार पर होगा। अर्थात अतीत का जो वर्तमान से सम्बन्ध है वही सम्बन्ध वर्तमान का भविष्य से है। सारा संसार ही नहीं समस्त सृष्टि कार्य और कारण के सिद्धान्त के आधार पर चल रही है, जिसे हम कर्म और भाग्य का भी नाम दे सकते हैं। जो कुछ भी हम कर रहे हैं उसका परिणाम हमें भुगतना ही होगा। इसलिए हम यदि अपना भविष्य स्वर्णिम बनाना चाहते हैं तो हमें अच्छे से अच्छे कार्य करने होंगे।

समीर को नैनीताल के ‘जोशी लॉज़’ में एक अद्भुत अनुभव होता है। वहाँ पर समीर अपनी उम्र के पैंतीस वर्ष अतीत में पहुँच जाता है। उसकी भेंट सैम नामक युवक से होती है। सैम से उसे पता चलता है कि योग और मंत्र की साधना से उसने अपना अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों जान लिया है। अर्थात वह साधना की उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ मनुष्य अपना प्रारब्‍ध जान लेता है।

समीर को यह जीवन्त अनुभव जैसा लगता है परन्तु वास्तव में ऐसा नींद में हुआ। सैम से उसकी भेंट पूर्वजन्म से जुड़ी थी। ‘समयचक्र’ की परिक्रमा प्रत्येक मनुष्य करता है। समीर को यह अनुभव अपने जीवन में अनेक बार होता है। उसे विश्वास हो जाता है कि कर्म और भाग्यवाद का सम्बन्ध अवश्य ही पूर्वजन्म और पुनर्जन्म से है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 96p
Price ₹295.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Dhirendra Verma

Author: Dhirendra Verma

धीरेन्द्र वर्मा 

जन्म : 27 दिसम्बर, 1936; इलाहाबाद।

शिक्षा : हिन्दी, अंग्रेजी और राजनीतिशास्त्र लेकर बी.ए., लखनऊ विश्वविद्यालय; राजनीतिशास्त्र में एम.ए., लखनऊ विश्वविद्यालय।

प्रकाशन : पिछले 50 वर्षों से साहित्य से सम्बद्ध, ‘किस्सा प्रीतम पांडे का’ पहला उपन्यास सत्तर के दशक में प्रकाशित हुआ जो हास्य व्यंग्य का एक सशक्त हस्ताक्षर बना।

तदुपरान्त हिन्दी में ‘नयी दिशा’ समेत सात उपन्यास एवं एक कहानी-संग्रह प्रकाशित, हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में कहानियाँ एवं लेख प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के लिए स्वतंत्र लेखन। ‘भगवतीचरण वर्मा रचनावली’ का सम्पादन।

कान्यकुब्ज डिग्री कॉलेज, लखनऊ में राजनीतिशास्त्र विभाग में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त।

सम्पर्क : चित्रलेखा, महानगर, लखनऊ।

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