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Prem Gali Ati Sankri-Hard Cover

Author: Shazi Zaman
ISBN: 9788126723027
Edition: 2012, Ed. 2nd
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
Special Price ₹170.00 Regular Price ₹200.00
15% Off
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9788126723027
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नाम के बावजूद, परम्परागत मायने में ये कोई प्रेमकथा नहीं, क्योंकि ये किसी तर्कसंगत (दुनियावी मायने में तर्कसंगत) मुक़ाम तक नहीं पहुँचती, लेकिन ये ज़रूर ज़ाहिर करती है कि कोई भी दृष्टिकोण—आधुनिक या परम्परागत—इंसानी ताल्लुक़ात की बारीकी, पेचीदगी और उसके ‘डाइनेमिक्स’ को पूरे तौर पर समझा पाने में सक्षम नहीं है।

‘प्रेम गली अति साँकरी’ की शुरुआत लन्दन के इंडियन वाई.एम.सी.ए. से होती है एक रूहानी बहस के साथ—एक बहस जो कबीर और कल्पना को एक-दूसरे से क़रीब लेकिन इतिहास में बहुत दूर और समाज में बहुत गहरे तक ले जाती है। कहानी का हर पात्र—कबीर, कल्पना, मौलाना, शायर, प्रोफ़ेसर— अपने आप में एक प्रतीक है। इन पात्रों के लन्दन की एक छत के नीचे जमा हो जाने से सामाजिक और व्यक्तिगत परिवेश की परतें खुलती जाती हैं, और कबीर और कल्पना के बीच धूप-छाँव के ताल्लुक़ात से ‘जेंडर रिलेशंज़’ की हज़ारों बरस की आकृति—और विकृति—दिखती जाती है। वो ‘बातों के सवार’ होकर न जाने कहाँ-कहाँ तक चले जाते हैं।

इंडियन वाई.एम.सी.ए. की नाश्ते की मेज़ से शुरू होनेवाली कहानी का आख़िरी (फ़िलहाल आख़िरी) पड़ाव है लन्दन की हाइगेट सीमेट्री—कार्ल मार्क्स की आख़िरी आरामगाह—जहाँ बहस है मार्क्स, क्लास और जज़्बात की। कल्पना का यह आरोप कि मार्क्स ने जगह ही नहीं छोड़ी इंसानी रूह के लिए, ‘बातों के सवार’ को मजबूर करता है यह सोचने पर कि क्या हालात और जज़्बात होते हैं जो हमेशा लोगों को क़रीब और दूर करते रहे हैं।

“ऐसा सबद कबीर का, काल से लेत छुड़ाय,” तुमने कहा।

“कार्ल से लेत छुड़ाय,” मैंने एक ठहाका लगाकर कहा।

ख़ामोश क़ब्रिस्तान में ठहाका काफ़ी देर तक और दूर-दूर तक गूँजता रहा। ‘बातों के सवार’ आसमान के बदलते हुए रंग को देखते रहे।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2002
Edition Year 2012, Ed. 2nd
Pages 104p
Price ₹200.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Shazi Zaman

Author: Shazi Zaman

शाज़ी ज़माँ

शाज़ी ज़माँ दिल्ली में पैदा हुए; सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज, दिल्ली, से इतिहास में स्नातक हुए। लगभग साढ़े तीन दशक से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं। इस अर्से में वो दूरदर्शन, ज़ी न्यूज़, बीबीसी लन्दन, आज तक और स्टार न्यूज़ से जुड़े, एबीपी न्यूज़ नेटवर्क के समूह सम्पादक रहे और पीटीआई के डायरेक्टर, वीडियो सर्विसेज़। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के सम्पादकों की शीर्ष संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्ज़ एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे हैं। दो प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों—फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्यूनिकेशन की कार्यकारी परिषद के सदस्य रह चुके हैं। ‘अकबर’ उपन्यास इनकी सर्वाधिक चर्चित कृति है जो हिन्दी-अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। ‘प्रेमगली’ नाम से एक विलक्षण औपन्यासिक शृंखला के तीन मोड़ (पहला, उल्टा, अंधा) क्रमश: ‘प्रेम गली अति साँकरी’, ‘जिस्म जिस्म के लोग’ और ‘झिलमिल’ नाम से प्रकाशित हैं। अंग्रेज़ी में दो और किताबें हैं—‘अकबर द ग्रेट सीईओ’ और ‘ऐलिगेटर एंड द स्टेप्लर एंड अदर मैजिकल टेल्ज़’।

साहित्यिक लेखन के लिए उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली का गद्य विधा सम्मान मिला। अपनी ज़िन्दगी के कुछ साल लन्दन और मुम्बई में गुज़ारने के बाद वे फिर दिल्ली में बस गए। इस समय पीटीआई वीडियो सेवा के सम्पादक हैं।

सम्पर्क : [email protected]

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