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Lok Sahitya Ka Adhyayan

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Lok Sahitya Ka Adhyayan

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भारतवर्ष के विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य के साथ-साथ लोक साहित्य का अध्ययन और अध्यापन लोकवार्ता के बढ़ते हुए महत्त्व का द्योतक सिद्ध हो रहा है।
लोक साहित्य के पाश्चात्य और भारतीय विकाससूत्रों को स्पष्ट करते हुए मुख्यतः हिन्दी प्रदेश को आधार बनाकर उन सामाजिक स्थितियों का उल्लेख इस पुस्तक में किया है, जो लोक साहित्य का निर्माण करती हैं। विश्वास है कि लोक रचनाओं का सम्यक् विश्लेषण उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में ही कर सकना सम्भव है। लोक रचनाओं का कथ्य एवं रूपशिल्प गायकों एवं श्रोताओं की मनःस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है। अतः लोक साहित्य का विवेचन उसके बाहर रह कर नहीं, बल्कि उसके भीतर आकर अर्थात् लोकमानस में पैठ कर करना चाहिए। इन्हीं बिन्दुओं को आधार बना कर यहाँ 'लोक' और उसके 'वार्ता साहित्य' शब्दों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है। हिन्दी में तत्सम्बन्धी कार्य का आकलन करते हुए रचनाओं के मूल स्रोतों से पाठकों को अवगत कराना इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
आशा है कि यह पुस्तक न केवल हिन्दी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए बल्कि लोकसाहित्य के सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 256p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Author: Dr.Trilochan Pandey

डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय
अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में व्याख्याता के पद पर कार्य करने के उपरान्त जबलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात गुवाहाटी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर रहते हुये अध्यापन कार्य किया।
साहित्य सेवा त्रिलोचन पाण्डेय का लोक कथाओं का संग्रह 1954 का है। इसका शुभारम्भ आगरा विश्वविद्यालय द्वारा कुमाऊँनी लोक कथाओं और गीतों पर लिखे गए एक शोध पत्र के लिए दिये गये पुरस्कार से हुआ जिससे प्रेरित होकर उन्होंने कुमाऊँ के विभिन्न भागों से लगभग 500 लोकगीत, 80 गाथागीत, 70 लोक कथाएँ, 2000 कहावतें, 200 पहेलियाँ और बच्चों के खेल संकलित किए।
इसी समय इंडियाना विश्वविद्यालय ने इलाहाबाद में एक भारतीय लोककथा संस्थान की स्थापना की और संस्थान ने 'एशियन फोकलोर स्टडीज' नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया। 1962 में त्रिलोचन पाण्डेय, जो उस समय अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में व्याख्याता थे, इंडियाना विश्वविद्यालय के लोककथा कार्यक्रम में भाग लेने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गए। 1960 के दशक से 1980 के दशक तक लोक कथाओं और गाथा गीतों का निरंतर प्रकाशन होता रहा, जो हमेशा कुमाऊँनी और हिंदी दोनों भाषाओं में होते थे।
कुमाऊँनी भाषा और उसका साहित्य (1977), बीती बातें (1977), कुमाऊँनी लोक साहित्य की पृष्ठभूमि (1979), लोक साहित्य का अध्ययन (1979), भाषा विज्ञान और हिन्दी भाषा की भूमिका (1987) इत्यादि महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित।

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