वैशाली को गणतंत्र की जननी कहा जाता है। गणतंत्र की स्थापना यहाँ यूनान से भी पहले हो चुकी थी। छठी शताब्दी ईसा-पूर्व की कुछ शताब्दियाँ वैशाली के उत्कर्ष का काल थीं। उस समय यह एक शक्तिशाली महाजनपद की राजधानी थी। अजातशत्रु द्वारा वृज्जिसंघ पर विजय एवं वैशाली के मगध में विलय के बाद भी इस नगर का महत्त्व बना रहा।
राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में, वैशाली के विस्तृत इतिहास ने पहले-पहल भारतीयों को बतलाया कि हम सदा निरंकुश राजाओं के जुओं को ही नहीं ढोते रहे, बल्कि हमारे यहाँ भी अपने प्रजातंत्र थे। वैशाली प्रजातंत्र बहुत शक्तिशाली था। यह ज्ञान की स्थली भी रही। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, “वैशाली ज्ञान, कर्म और राजशक्ति की त्रिवेणी रही है। ब्राह्मण, बौद्ध और जैन-परम्परा की त्रिवेणी रही है। ज्ञानशक्ति, आत्मशक्ति और धनशक्ति की त्रिवेणी रही है।”
बौद्ध धर्म की कई महत्त्वपूर्ण घटनाएँ भी वैशाली से सम्बन्धित हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है बौद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति। वैशाली में ही बुद्ध की मौसी महाप्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पानेवाली पहली भिक्षुणी बनीं। वैशाली की प्रसिद्ध राजनर्तकी अम्बपाली संघ में प्रवेश पानेवाली दूसरी महिला थी।
‘वैशाली की विरासत’ में इसी वैशाली की खोज की गई है और इसका माध्यम बने हैं हिन्दी के साहित्यकारों, बौद्धिकों और इतिहासज्ञों द्वारा लिखे वे सूचनापरक आलेख जो उन्होंने वैशाली से अपने अनुराग के कारण, वहाँ के ऐतिहासिक महत्त्व से अभिभूत होकर लिखे। पुस्तक में उन व्यक्तित्वों पर केन्द्रित आलेख भी शामिल किये गए हैं जिनका सम्बन्ध इस क्षेत्र से रहा है।
वैशाली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व पर रोशनी डालने वाली यह पुस्तक एक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में संग्रहणीय है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 316p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 20.5 X 13.5 X 2 |