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Mere Dil Mere Musafir-Hard Cover

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9788126720408
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फ़ैज़ को ज़िन्दगी और सुन्दरता से प्यार है—भरपूर प्यार, और इसीलिए जब उन्हें मानवता पर मौत और बदसूरती की छाया मँडराती दिखाई देती है, वह उसको दूर करने के लिए बड़ी-से-बड़ी आहुति देने से भी नहीं चूकते। उनका जीवन इसी पवित्र संघर्ष का प्रतीक है और उनकी शाइरी इसी का संगीत।

‘मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर’ फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की नज़्मों और ग़ज़लों का संग्रह है। इस संग्रह की ख़ासियत यह है कि रचनाओं को उर्दू और नागरी दोनों लिपियों में रखा गया है। अपनी रचनात्मक भावभूमि पर इस संग्रह की कविताएँ फ़ैज़ के ‘जीवन-काल के विभिन्न चरणों की प्रतीक हैं और यह चरण उनके पूरे जीवन और पूरी कविता के चरित्र का ही स्वाभाविक अंग है।’ इंसान और इंसानियत के हक़ में उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी है और अवाम के दु:ख-दर्द और उसके ग़ुस्‍से को दिल की गहराइयों में डूबकर क़लमबन्द किया है। इसके लिए हुक्मरानों का हरेक कोप और हर सज़ा क़बूल करते हुए आजीवन क़ुर्बानियाँ दीं।

ज़ाहिरा तौर पर उनकी शायरी सच्चे इंसानों की हिम्मत, इंसानियत से उनके प्यार और एक ख़ूबसूरत भविष्य के लिए जीत के विश्वास से पैदा हुई है; और इसीलिए उनकी आवाज़ दुनिया के हर संघर्षशील आदमी की ऐसी आवाज़ है ‘जो क़ैदख़ानों की सलाख़ों से भी छन जाती है और फाँसी के फन्दों से भी गूँज उठती है।’

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1982
Edition Year 2024, Ed. 6th
Pages 123p
Price ₹495.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Faiz Ahmed 'Faiz'

Author: Faiz Ahmed 'Faiz'

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म 13 फ़रवरी, 1911 को सियालकोट में हुआ। उन्होंने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की एक शाखा पंजाब में आरम्भ की। 1935 में एम.ए.ओ. कॉलेज, अमृतसर और बाद में हेली कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, लाहौर में अध्यापन किया। 1938-1942 के दौरान उर्दू मासिक ‘अदबे लतीफ़’ के सम्पादक रहे। कुछ समय तक ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भी रहे। 1964 में लन्दन से वापस आने के बाद वे कराची में अब्दुल्लाह हारून कॉलेज के प्रिंसिपल नियुक्त हुए। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘नक़्श-ए-फ़रियादी’, ‘दस्ते-सबा’, ‘ज़िन्दाँनामा’, ‘मीज़ान’, ‘दस्ते-तहे-संग’, ‘सरे-वादी-ए-सीना’, ‘शामे-श्‍हरे-याराँ’, ‘मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर’, ‘सारे सुख़न हमारे’ (फ़ैज़ समग्र) लन्दन से और ‘नुस्ख़हा-ए-वफ़ा’ (फ़ैज़ समग्र) पाकिस्तान से। उन्हें ‘लेनिन पीस प्राइज़’, ‘द पीस प्राइज़’, ‘निशाने-इम्तियाज़’ (मरणोपरान्त) से नवाज़ा गया। 1984 में मृत्यु से पहले ‘नोबेल प्राइज़’ के लिए भी उनका नामांकन हुआ।

20 नवम्बर, 1984 को लाहौर में उनका निधन हुआ।

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