विख्यात व्यंग्यकार तथा उपन्यासकार ज्ञान चतुर्वेदी का यह तीसरा उपन्यास है। उनके पिछले दो उपन्यासों—‘नरक यात्रा’ और ‘बारामासी’—का हिन्दी पाठक जगत् ने तो अप्रतिम स्वागत किया ही, साथ ही विभिन्न आलोचकों तथा समीक्षकों ने इन्हें हिन्दी व्यंग्य तथा उपन्यास के क्षेत्र की उल्लेखनीय घटना के रूप में दर्ज किया है। ‘बारामासी’ तो हिन्दी उपन्यासों की उज्ज्वल परम्परा में एक आदरणीय स्थान बना चुका है और इधर के वर्षों में हिन्दी की गिनी-चुनी बहुचर्चित कृतियों में से एक रहा है।
‘मरीचिका’ हमें नितान्त नए ज्ञान चतुर्वेदी से परिचित कराता है। इस पौराणिक फ़ैंटेसी में वे भाषा, शैली, कथन तथा कहन के स्तर पर एकदम निराली तथा नई ज़मीन पर खड़े दीखते हैं। यहाँ वे व्यंग्य को एक सार्वभौमिक चिन्ता में तब्दील करते हुए ‘पादुकाराज’ के मेटाफ़र के माध्यम से समकालीन भारतीय आमजन और दरिद्र समाज की व्यथा-कथा को अपने बेजोड़ व्यंग्यात्मक लहज़े में कुछ इस प्रकार कहते हैं कि पाठक के समक्ष निरंकुश सत्ता का भ्रष्ट तथा जनविरोधी तंत्र, राजकवि तथा राज्याश्रयी आश्रमों के रूप में सत्ता से जुड़े भोगवादी बुद्धिजीवी और पादुकामंत्री, सेनापति-पादुका राजसभा आदि के ज़रिए आसपास तथाकथित श्रेष्ठिजनों के बीच जारी सत्ता-संघर्ष का मायावी परन्तु भयानक सत्य—सब कुछ अपनी सम्पूर्ण नग्नता में निरावृत हो जाता है। ‘पादुकाराज’, ‘अयोध्या’ तथा ‘रामराज’ के बहाने ज्ञान चतुर्वेदी मात्र सत्ता के खेल और उसके चालक कारकों का ही व्यंग्यात्मक विश्लेषण नहीं करते हैं, वे मूलतः इस क्रूर खेल में फँसे भारतीय दरिद्र प्रजा के मन में रचे-बसे उस यूटोपिया की भी बेहद निर्मम पड़ताल करते हैं, जो उस ‘रामराज’ के स्थापित होने के भ्रम में ‘पादुका-राज’ को सहन करती रहती है, जो सदैव ही मरीचिका बनकर उसके सपनों को छलता रहा है।
स्वर्ग तथा देवता की एक समान्तर कथा भी उपन्यास में चलती रहती है, जो भारत के आला अफ़सरों की समान्तर परन्तु मानो धरती से अलग ही बसी दुनिया पर बेजोड़ टिप्पणी बन गई है। जब अयोध्या ब्रह्मांड तक जल रही हो, तब भी देवता की दुनिया में उसकी आँच तक नहीं पहुँचती। आधुनिक भारत के इन ‘देवताओं’ का यह स्वर्ग ज्ञान के चुस्त फिकरों, अद्भुत विट और निर्मल हास्य के प्रसंगों के ज़रिए पाठकों के समक्ष ऐसा अवतरित होता है कि वह एक साथ ही वितृष्णा भी उत्पन्न करता है और करुणा भी। और शायद क्रोध भी।
पौराणिक कथा के बहाने आधुनिक भारत की चिन्ताओं की ऐसी रोचक व्यंग्य कथा बुन पाना ही पुनः ज्ञान चतुर्वेदी को हिन्दी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गद्यकार के रूप में रेखांकित करता है। हिन्दी में फ़ैंटेसी गिनी-चुनी ही है। विशेष तौर पर हिन्दी व्यंग्य में पौराणिक फैंटेसी जो लिखी भी गई है, वह प्रायः फूहड़ तथा सतही निर्वाह में भटक गई है। इस लिहाज़ से भी ‘मरीचिका’ एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2004 |
| Edition Year | 2014 |
| Pages | 332p |
| Price | ₹550.00 |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14 X 2 |