भारतवर्ष के विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य के साथ-साथ लोक साहित्य का अध्ययन और अध्यापन लोकवार्ता के बढ़ते हुए महत्त्व का द्योतक सिद्ध हो रहा है।
लोक साहित्य के पाश्चात्य और भारतीय विकाससूत्रों को स्पष्ट करते हुए मुख्यतः हिन्दी प्रदेश को आधार बनाकर उन सामाजिक स्थितियों का उल्लेख इस पुस्तक में किया है, जो लोक साहित्य का निर्माण करती हैं। विश्वास है कि लोक रचनाओं का सम्यक् विश्लेषण उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में ही कर सकना सम्भव है। लोक रचनाओं का कथ्य एवं रूपशिल्प गायकों एवं श्रोताओं की मनःस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है। अतः लोक साहित्य का विवेचन उसके बाहर रह कर नहीं, बल्कि उसके भीतर आकर अर्थात् लोकमानस में पैठ कर करना चाहिए। इन्हीं बिन्दुओं को आधार बना कर यहाँ 'लोक' और उसके 'वार्ता साहित्य' शब्दों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है। हिन्दी में तत्सम्बन्धी कार्य का आकलन करते हुए रचनाओं के मूल स्रोतों से पाठकों को अवगत कराना इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
आशा है कि यह पुस्तक न केवल हिन्दी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए बल्कि लोकसाहित्य के सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 256p |
| Price | ₹350.00 |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14 X 1.5 |