गिरीश कारनाड आधुनिक भारत की महानतम सांस्कृतिक हस्तियों में से एक थे—एक कुशल अभिनेता, लीक से हटकर काम करने वाले निर्देशक, नवोन्मेषकारी प्रशासक, साफ़ सोच के धनी विचारक और एक असाधारण नाटककार। सार्वजनिक भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में वे एक ऐसे बुद्धिजीवी के रूप में जाने जाते रहे जिनका नैतिक कम्पास कभी नहीं डिगा।
‘खेल-खेल में बीता जीवन’ में वे अपने जीवन के पूर्वार्द्ध का वर्णन करते हैं। सिरसी में अपने बचपन और स्थानीय थिएटर से शुरुआती जुड़ाव से लेकर, धारवाड़, बॉम्बे और ऑक्सफ़ोर्ड में अपनी शिक्षा, पब्लिशिंग में अपने करियर, फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी सफलताओं और मुश्किलों, और अपने निजी और लेखकीय जीवन के बारे में वे इसमें बहुत गहरी संलग्नता के साथ लिखते हैं।
भावप्रवण और दिलचस्प, गहरी समझ वाली और बेबाक, उनकी ये यादें एक महान जीनियस के जीवन को आकार देने वाले अनुभवों का अविस्मरणीय ख़ाका खींचती हैं। इसमें उस भारत की भी एक अनोखी झलक हमें मिलती है जिसमें वे रहते थे और काम करते थे।
अपने सहपाठियों, सहकर्मियों, दोस्तों, साथी लेखकों-निर्देशकों और अन्य कला व्यक्तित्वों के बारे में भी उन्होंने इसमें गहन अन्तदृष्टि के साथ लिखा है, जिससे हमें उस दौर के सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश से अवगत होने का अवसर मिलता है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Usharani Rao |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 320p |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |