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Jungleman Ki Diary

Author: Kabir Sanjay
Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Jungleman Ki Diary

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हम जिस संसार में रहते हैं वह साझे का संसार है। हमारी पृथ्वी तमाम जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का साझा घर है। लेकिन सभ्यता के लम्बे अन्तराल में, मनुष्य ने यह ग़फ़लत पाल ली कि वही इसका अकेला मालिक है। इससे प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध लगातार जटिल होता गया, वह अपने आप तक सिमटता गया। यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। क्या यह सच नहीं कि आज मनुष्य की अपने आसपास के पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और नदी-पहाड़ों से ही नहीं, दूसरे मनुष्यों से भी रिश्तों, संवादों और भावनाओं की साझेदारी लगातार घटती गई है? इस अलगाव ने पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को ही संकटग्रस्त कर दिया है।

सचाई यह है कि मानव-जीवन की कोई भी तस्वीर केवल मानवों से पूरी नहीं होती। प्रकृति उन तस्वीरों में रंग भरती है। हमारे साथ इस धरती को साझा करने वाले तमाम पशु-पक्षी हमारी अधूरी कहानियों को पूरा करते हैं। हमारी स्मृति में उनकी यादें बसी होती हैं—बचपन का कोई पेड़, अपनी नदी का घाट, नासमझी में किसी पक्षी के साथ हुआ गुनाह, भावनाओं को कुरेदने वाली फूलों की कोई गन्ध, अनजान रास्तों पर सीखे गए ज़रूरी सबक़, किसी पेड़ के थाले में छिपाया गया पछतावा, हर पल जनम लेता जीवन। कुछ कहा-कुछ अनकहा! ‘जंगलमन की डायरी’ में ऐसी ही कुछ भावनाओं की पेशी हुई है। कुछ जवाब तलब किए गए हैं। जीवन के लिए ज़रूरी लेकिन ओझल होते जा रहे कुछ रंग यहाँ पहचाने जा सकते हैं। प्रकृति के साथ जीवन के साहचर्य की ये कहानियाँ, ऐसी प्रकृति-कथाएँ हैं जो हमारी दृष्टि और दुनिया दोनों को बड़ा करती हैं।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 168p
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Kabir Sanjay

Author: Kabir Sanjay

कबीर संजय

कबीर संजय का जन्म 10 जुलाई, 1977 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया है। साहित्य के अलावा सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। पर्यावरण और वन्यजीवन से जुड़े सवाल उनकी रचनात्मकता के केन्द्र में हैं। उनकी प्रकाशित कृतियाँ ‌हैं—‘सुरखाब के पंख’, ‘फेंगशुई’ (कहानी-संग्रह); ‘चीता : भारतीय जंगलों का गुम शहजादा’, ‘ओरांग उटान : अनाथ, बेघर और सेक्स ग़ुलाम’, ‘गोडावण : मोरे अंगना की सोन चिरैया’ (वन्य जीवन); ‘जंगलमन की डायरी’ (पर्यावरण)। ‘तद्भव’, ‘पल प्रतिपल’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘वनमाली कथा’, ‘लमही’, ‘कादम्बिनी’, ‘इतिहासबोध’, ‘गंगा-जमुना’ और ‘हिन्दुस्तान’ सहित हिन्दी की प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘जंगलकथा’ पर्यावरण और वन्यजीवन पर केन्द्रित उनका लोकप्रिय फेसबुक पेज है। उनकी कहानी ‘पत्थर के फूल’ लखनऊ में मंचित हो चुकी है। ‘सुरखाब के पंख’ कहानी-संग्रह के लिए उन्हें प्रथम ‘रवीन्द्र कालिया स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया है।

फिलहाल साहित्य और पत्रकारिता में रमे हुए हैं।

ई-मेल : [email protected] 

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